Nigaho Ke Saye (Pb)

Author:

Jaan Nisar Akhtar

Publisher:

Rajkamal Parkashan Pvt Ltd

Rs205 Rs250 18% OFF

Availability: Available

Publisher

Rajkamal Parkashan Pvt Ltd

Publication Year 2020
ISBN-13

9789389598629

ISBN-10 9389598621
Binding

Paper Back

Number of Pages 230 Pages
Language (Hindi)
Dimensions (Cms) 20 x 14 x 4
Weight (grms) 290
जाँ निसार अख़्तर के फ़िल्मी नग़में साहिर लुधियानवी की शायरी की तरह तख़्लीक़ीयत और ग़िनाइयत की बदौलत हमेशा तर-ओ-ताज़ा रहेंगे। ऐसे सच्चे शायर की जगह तारीख़ में तो होती ही है, लोगों के दिलों में भी महफूज़ रहती है।” —डॉ. गोपीचन्द नारंग “मेरी मुसीक़ी की कामयाबी में बहुत ही अहमतरीन भूमिका निभाई थी जाँ निसार साहब की राइटिंग ने। आप ही बताइए अय दिल-ए-नादाँ… क्या ग़ज़ब का गीत नहीं है? यह नग़मा अपने आप में रेवोल्यूशन था रेवोल्यूशन।” —ख़य्याम “मैं विजय अकेला को बहुत-बहुत बधाई देता हूँ जिन्होंने इस किताब को सम्पादित करके फ़िल्म जगत के एक महत्त्वपूर्ण गीतकार को पाठकों तक पहुँचाया है और इस ओर भी इशारा किया है कि गीतकारिता में अगर साहित्य भी मिल जाए तो फ़िल्म-गीत भी लम्बी उम्र पा लेते हैं जैसे जाँ निसार के इस गीत ने पाई है— ये दिल और उनकी निगाहों के साये मुझे घेर लेते हैं बाँहों के साये” —निदा फ़ाज़ली.

Jaan Nisar Akhtar

फ़रवरी, 1914 को खै़राबाद, ज़िला - सीतापुर में जन्म हुआ। पिता मुज्तर खै़राबादी उर्दू के प्रसिद्ध कवियों में से थे और घर का वातावरण साहित्यिक होने के कारण उनमें बचपन से ही शेर कहने की रुचि पैदा हुई और दस-ग्यारह वर्ष की आयु से कविता करने लगे। सन् 1939 में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से एम.ए. करने के बाद विक्टोरिया कॉलेज, ग्वालियर में उर्दू के प्राध्यापक नियुक्त हुए किन्तु 1947 में साम्प्रदायिक दंगे छिड़ जाने से त्याग-पत्र देकर भोपाल चले गए और वहाँ हमीदिया कॉलेज के उर्दू-फ़ारसी विभाग के अध्यक्ष बन गए। फिर 1950 में वहाँ से त्याग-पत्र देकर बम्बई चले गए। प्रारम्भ के रूमानी काव्य में धीरे-धीरे क्रान्तिवादी तत्त्वों का मिश्रण होता गया और वे यथार्थवाद की ओर बढ़ते गए। साम्राज्यवाद का विरोध और स्वदेश-प्रेम की भावना से इनकी कविता ओत-प्रोत रही। दूसरा महायुद्ध, आर्थिक दुर्दशा, राजनीतिक स्वाधीनता, विश्वशान्ति और ऐसी ही अनेक घटनाएँ हैं जिनको ‘अख़्तर’ ने वाणी प्रदान की। आज के जीवन-संघर्ष को वे कल के नव-निर्माण का सूचक मानते थे। उनके काव्य में सामाजिक यथार्थ का गहरा बोध परिलक्षित होता है और उनके काव्य का लक्ष्य वह मानव है जो प्रकृति पर विजय प्राप्त कर सुन्दर, सरस और सन्तुलित जीवन के निर्माण के लिए संघर्षशील है। उनके कला-बोध की परिपक्वता एक ओर तो उनकी सम्पन्न काव्य-दाय और दूसरी ओर उर्दू-फ़ारसी साहित्य के गहन अध्ययन की देन है। प्रस्तुत पुस्तक का विषय-चयन तथा काव्य-संपादन उनकी उपर्युक्त विशेषताओं का ही परिणाम है। वे वर्षों फ़िल्म-जगत से सम्बद्ध रहे और उनके अनेक फ़िल्मी गीत विशेषतः लोकप्रिय हुए। निधन: 18 अगस्त, 1976