Aadivasi : Vikas Se Visthapan

Author :

Ramanika Gupta

Publisher:

Radhakrishna Prakashan

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Publisher

Radhakrishna Prakashan

Publication Year 2008
ISBN-13

9788183612173

ISBN-10 8183612172
Binding

Hardcover

Number of Pages 156 Pages
Language (Hindi)
Dimensions (Cms) 22 X 14.5 X 1.5

आदिवासियों का पलायन और विस्थापन सदियों से होता रहा है और ये आज भी जारी है। आदिवासियों के जंगलों, ज़मीनों, गाँवों, संसाधनों पर क़ब्ज़ा कर उन्हें दर-दर भटकने के लिए मजबूर करने के पीछे मुख्य कारण हमारी सरकारी व्यवस्था रही है। वे केवल अपने जंगलों, संसाधनों या गाँवों से ही बेदख़ल नहीं हुए बल्कि मूल्यों, नैतिक अवधारणाओं, जीवन-शैलियों, भाषाओं एवं संस्कृति से भी वे बेदख़ल कर दिए गए हैं। हमारे मौलिक सिद्धान्तों के अन्तर्गत सभी को विकास का समान अधिकार है। लेकिन आज़ादी के बाद के पहले पाँच वर्षों में लगभग ढाई लाख लोगों में से 25 प्रतिशत आदिवासियों को मजबूरन विस्थापित होना पड़ा। विकास के नाम पर लाखों लोगों को अपनी रोज़ी-रोटी, काम-धंधों तथा ज़मीनों से हाथ धोना पड़ा। उनको मिलनेवाले मूलभूत अधिकार जो उनकी ज़मीनों से जुड़े थे, वे भी उन्हें प्राप्त नहीं हुए।

आदिवासियों के प्रति सरकार तथा तथाकथित मुख्यधारा के समाज के लोगों का नज़रिया कभी संतोषजनक नहीं रहा। आदिवासियों को सरकार द्वारा पुनर्वसित करने का प्रयास भी पूर्ण रूप से सार्थक नहीं हो सका। अन्ततः अपनी ही ज़मीनों व संसाधनों से विलग हुए आदिवासियों का जीवन मरणासन्न अवस्था में पहुँच गया। 21वीं सदी में पहुँचकर भी हमारे देश का आदिवासी समाज जहाँ विकास की बाट जोह रहा है। वहीं दूसरी तरफ़ सरकार की उदासीन नीतियों के कारण उनकी स्थिति ज्यों की त्यों ही है।

विकास के नाम पर छले जा रहे आदिवासियों के पलायन और विस्थापन आदि समस्याओं पर केन्द्रित यह पुस्तक समाज और सरकार के सम्मुख कई सवाल खड़े करती है।

Ramanika Gupta

जन्म : 22 अप्रैल, 1930; सुनाम (पंजाब)। शिक्षा : एम.ए., बी.एड.। रमणिका गुप्ता बिहार/झारखंड की विधायक एवं विधान परिषद् की सदस्य रहीं। कई ग़ैर-सरकारी एवं स्वयंसेवी संस्थाओं से सम्बद्ध तथा सामाजिक, सांस्कृतिक व राजनैतिक कार्यक्रमों में सहभागिता। आदिवासी, दलित, महिलाओं व वंचितों के लिए आजीवन कार्यरत। कई देशों की यात्राएँ। विभिन्न सम्मानों एवं पुरस्कारों से सम्मानित जिनमें ‘गणेश शंकर विद्यार्थी पुरस्कार’, ‘आजीवन आदिवासी बंधु पुरस्कार’ भी शामिल हैं। प्रकाशित कृतियाँ : अब तक 16 कविता-संग्रह, दो उपन्यास, दो कहानी-संग्रह, दो कहानी-संग्रह सम्पादित, एक यात्रा-संस्मरण और दो आत्मकथा—‘आपहुदरी’ व ‘हादसे’। राष्ट्रीय आदिवासी दलित व नारी-विमर्श पर महत्त्पूर्ण पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। इनके द्वारा सम्पादित दलित, स्त्री एवं आदिवासी विषयक पुस्तकें बहुचर्चित रही हैं। ‘निज घरे परदेसी’, ‘साम्प्रदायिकता के बदलते चेहरे’, ‘आदिवासी स्वर और नई शताब्दी’, ‘आदिवासी : विकास से विस्थापन’, ‘आदिवासी साहित्य यात्रा’, ‘आदिवासी शौर्य एवं विद्रोह (पूर्वोत्तर)’, ‘आदिवासी शौर्य एवं विद्रोह (झारखंड)’, ‘आदिवसी सृजन, मिथक एवं अन्य लोककथाएँ (झारखंड, महाराष्ट्र, गुजरात और अंडमान-निकोबार)’, ‘आदिवासी लेखन एक उभरती चेतना’, ‘आदिवासी अस्मिता के संकट’, ‘आदिवासी सहित्य और समाज’ एवं ‘विमुक्त-घुमन्तू आदिवासियों का मुक्ति-संघर्ष’ आदिवासी-विमर्श पर इनकी उल्लेखनीय लिखित, संकलित एवं सम्पादित पुस्तकें हैं। स्त्री-विमर्श पर भी इनकी कई पुस्तकें प्रकाशित हैं। वे आजीवन ‘रमणिका फ़ाउंडेशन’ की अध्यक्ष रहीं। उन्‍होंने सन् 1985 से ‘युद्धरत आम आदमी’ (मासिक हिन्दी पत्रिका) का सम्पादन किया। निधन : 26 मार्च, 2019
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