| Publisher |
Rajkamal Prakashan |
| Publication Year |
2002 |
| ISBN-13 |
9788126715275 |
| ISBN-10 |
8126715278 |
| Binding |
Paperback |
| Number of Pages |
463 Pages |
| Language |
(Hindi) |
| Dimensions (Cms) |
22 X 14.5 X 3 |
| Subject |
Linguistics |
भाषा और समाज सरीखे अत्यन्त गहन विषय पर डॉ. रामविलास शर्मा का यह एक महत्त्वपूर्ण मौलिक ग्रन्थ है। इसमें सामाजिक विकास के सन्दर्भ में भाषा के विकास का अध्ययन करते हुए भाषाशास्त्र और समाजशास्त्र की अनेक मान्यताओं का गहन विद्वत्ता के साथ खंडन-मंडन किया गया है। सैद्धान्तिक विवेचन के अलावा इसमें भाषा-सम्बन्धी अनेक व्यावहारिक समस्याओं का भी विवेचन है। उदाहरण के लिए, भारत की राजभाषा और राष्ट्रभाषा की समस्या, अहिन्दीभाषी प्रदेशों में असन्तोष के कारण, क्या भारत की सभी भाषाएँ राजभाषा बनेंगी? क्या अंग्रेज़ी विश्वभाषा है और उसके बिना हमारा काम नहीं चल सकता?—आदि प्रश्नों पर भी इसमें प्रकाश डाला गया है।
यह पुस्तक न केवल भाषाविज्ञान का शास्त्रीय अध्ययन करनेवालों के लिए, बल्कि उन पाठकों के लिए भी उपयोगी है, जो इन समस्याओं में गहरी दिलचस्पी रखते हैं।
Ramvilas Sharma
Rajkamal Prakashan