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Dalit Sahitya Ke Aagami Mod

Author :

Rampratap Neeraj (Editor)

Publisher:

VANI PRAKSHAN

Rs636 Rs795 20% OFF

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Publisher

VANI PRAKSHAN

Publication Year 2026
ISBN-13

9789371122467

ISBN-10 9371122463
Binding

Hardcover

Number of Pages 280 Pages
Language (Hindi)
Weight (grms) 450
Subject

Essays

भारतीय आज़ादी के पूर्व और उसके वर्षों बाद तक ज़मींदारी छिन जाने के बावजूद गाँवों एवं कस्बों में ज़मींदार-मालिकों का दबदबा क़ायम था जहाँ उनके द्वारा गाँव के बंधुआ मजदूरों और अभिशप्त दलितों को हाशिये पर रखा गया। मज़दूर ग्रामीण क्षेत्रों का वातावरण गाँव एवं कस्बाई जीवन जीने वाले बंधुआ एवं खेतिहर मज़दूरों का जीवन पूरी तरह वहाँ के क्रूर ज़मींदार-मालिक के हाथों में क़ैद था, जहाँ उनके आह भरने का स्पेस भी नहीं बचा था। इस अनवरत शोषण-अत्याचार से ग्रस्त उनकी इस मार को नियति मानकर उसी दमघोंटू परिवेश में जीने के लिए वे विवश हो गये थे, क्योंकि दूसरा विकल्प तब उनके सामने नहीं था। तत्कालीन गाँव की स्थिति ऐसी हो गयी थी कि अगर कोई दलित-मज़दूर ग़लती से भी टायर की मामूली चप्पल पहन लेते या फिर खाट-चौकी पर बैठे उस रास्ते से कोई ज़मींदार-मालिक या उनके सिपाही देख लेते तो तुरन्त उसे ड्योढ़ी पर हाज़िर होने का फ़रमान आ जाता। वहाँ उसे दीवार के पाये में बाँधकर पहले जीभर उसकी पिटाई की जाती और फिर उसी अधमरे हालत में उसके घर पर फेंकवा दिया जाता, ताकि गाँव में फिर कोई दलित-मज़दूर ऐसी हिमाक़त नहीं कर सके। तब इन ग़रीबों के लिए पूरा-का-पूरा दिन दहशत से भरा होता था। उन दिनों गाँवों में अत्याचार का आलम यह था कि दिन भर चिलचिलाती धूप, आँधी-तूफ़ान और बरसात में बँधुआ मज़दूर द्वारा मालिकों के खेत में हलवाही के बावजूद जब जी में आया उसकी जवान बेटी को ड्योढ़ी के बरसाती में बुलवाकर पहले उसके साथ मनमानी करता और फिर उसे भीतर के कमरे में ले जाकर उसके गिड़गिड़ाने की बग़ैर परवाह किये पहले उसके साथ निर्ममता से बलात्कार किया जाता और फिर उसी हालत में उसे कुएँ से पानी लाने का आदेश दिया जाता ताकि उसके नंगे जिस्म को मालिक का आला-अमला भी देख सके। जब शोषण-अत्याचार का यह सिलसिला चरमोत्कर्ष पर पहुँच गया तब गाँव के ग़रीब-मज़दूर एक प्लेटफ़ॉर्म पर गोलबन्द होकर उन ज़मींदार-मालिकों कि ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने लगे। कहना न होगा कि इसी अत्याचार के गर्भ से दलित साहित्य आकार लेने लगा, जिसमें मालिकों की मनमानी दफ़न होने लगी और बँधुआ मज़दूर होकर स्वतन्त्र भारत का हिस्सा बन गये।

Rampratap Neeraj (Editor)

रामप्रताप नीरज जन्म : 09 जुलाई, 1952, बुद्धनगर, ज़िला–सीतामढ़ी (बिहार) शिक्षा : पीएच.डी. (हिन्दी साहित्य), सत्यार्थरत्न, विद्यावाचस्पति, विद्यासागर। प्रकाशन : आधुनिक हिन्दी कहानी के प्रगतिशील आयाम (शोध प्रबन्ध), दरकती सीमा (कथा-संग्रह), समय साक्षी है (कविता-संकलन), कवि-कथाकारों के पत्र (पत्र-संकलन), संस्मरण के दायरे में (संस्मरण), राजा सलहेस : साहित्य और संस्कृति (लोक शोध-साहित्य)। सम्पादन : डॉ. अम्बेडकर की दलित अवधारणा, जंगल की धूप (कथा-संग्रह), साहित्य-कला साधक : डॉ. सुरेन्द्र मोहन प्रसाद, प्रणेता-परिवेश (मासिक पत्रिका), अभिनन्दन (राष्ट्रभाषा हिन्दी स्मारिका), साक्षरता सन्देश, पत्रिका इत्यादि। सम्मान : साहित्य सम्मान संस्कार भारती, उत्तर बिहार राज्य केन्द्र, मुजफ़्फ़रपुर, 2000, राष्ट्रभाषा सम्मान-हिन्दी प्रकोष्ठ, पंजाब नैशनल बैंक, 2001, गुरु रविदास सम्मान-पत्र, 2002, बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर सम्मान, 2004, सर्वसेवा शिखर सम्मान, 2007, विद्यासागर सर्वोच्च सम्मान, 2008, लाइफटाइम्स एचीवमेंट अवार्ड, 2015, गीतकार शैलेन्द्र प्रतिभा सम्मान, 2016। पूर्व प्राचार्य : एम.जे.के. कॉलेज, बेतिया (पश्चिम चम्पारण)।
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