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| Publisher | Radhakrishna Prakashan |
| Publication Year | 1997 |
| ISBN-13 | 9788171192922 |
| ISBN-10 | 8171192920 |
| Binding | Hardcover |
| Number of Pages | 158 Pages |
| Language | (Hindi) |
| Dimensions (Cms) | 19 X 12.5 X 1.5 |
परतों के बीच
‘‘जब विजयनगर साम्राज्य बढ़ा, राजधानी तुंगभद्रा के दक्षिणी किनारे मौजूदा हम्पी के पास ही कहीं ले आई गई। इस इतिहास के पार समय की एक और परत है जो इन अवशेषों से झाँकती है। यह किष्किंधा है-बालि-सुग्रीव की कर्मस्थली, हनुमान की जन्म और लीला स्थली, राम-सुग्रीव मित्रता की भूमि। अतीत की एक तीसरी परत भी थी जो हमारे साथ ही चल रही थी। राजा अच्युतदेव राय जो अनेगुंदी रियासत के राजा थे- राज्यों के स्वतंत्र भारत में विलय के ठीक पहले…
अतीत की परतों को भी अपने में से खरोंचकर निकाल अंततः प्रकृति के बीच खड़ा होना, नदी-पर्वत, पेड़ पौधों को उस तरह ही लेना जो वे हैं। एक से एक सुबहें रही होंगी-त्रेता युग में, विजयनगर काल में रजवाड़ों के समय उसके बाद भी….लेकिन यह सुबह जो आज है—ऐसी कभी नहीं हुई थी…’’
‘‘धुधभरी सुर्खी’, ‘दरख्तों के पार…शाम’और ‘झूलती जड़े’ के बाद गोविन्द मिश्र का यह चौथा यात्रावृत है। यात्रा में अपने साथ जो छोटे-छोटे अनुभव होते हैं उन्हें जीते हुए यात्रा-भूमि से साक्षात्कार-इधर-उधर से, कई कोणों-दृष्टिकोणों से इस तरह कि परतें खुलती चली जाएँ। यात्रा-भूमि एक व्यक्तित्व लेकर उठ खड़ी हो; अपने में हमें पूरी तरह से ले ले, उसमे डूबा जाया जाय…और डुबकी के बाद बाहर आओ तो वह भूमि अपने ओढ़न-पहरावन उतार फिर वापस अपनी पाशविक निर्मलता में सामने खड़ी हुई।
पार देखने, देखते चलने का क्रम जहाँ इन यात्रावृतों को एक बृहत् आयाम देता है, वहीं अपनी दुर्बलताओं के साथ लड़ते-झगड़ते, फिर भी चलते हुए लेखक की स्वयं को मिलकर उठा-पटक इन यात्रावृतों का दैहिक आकार बराबर बरकरार रखती है, इन्हें प्रभावी नहीं बनने देती। यहाँ बड़ी बातें है तो छोटी भी।
‘‘अधेड़ ड्राइवर सिगरेट जलाकर अपने असिस्टेंन्ट के साथ गाड़ी दुरूस्त करने में जुट गया। गाड़ी सुधारने में वह इस तरह तलीन हो जाता था जैसे कोई वैज्ञानिक अपनी लैब में काम कर रहा हो….साथ में उसका अस्सिटेंट। दोनों जैसे भूल जाते थे कि उन्हें कहीं जाना है और साथ में सवारियाँ भी हैं।…उनके सामने मुश्किलें कई थीं। पहली यह कि उनमें जितनी तल्लीनता थी, उतनी ही लियाकत कम। ऊपर से बीच-बीच में मेरी टोंका-टाका, खीझ….उनकी तल्लीनता टूट जाती…’’
उपन्यास का फैलाव और कहानी की गहराई अगर इन यात्रावृतों में जगह-जगह, एक जगह नजर आ जाए तो वह ताज्जूब की बात कतई नहीं होगी।
Govind Mishra
Radhakrishna Prakashan