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Prem Mein Ped Hona

Author :

Jacinta Kerketta

Publisher:

Rajkamal Prakashan

Rs169 Rs199 15% OFF

Availability: Available

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Publisher

Rajkamal Prakashan

Publication Year 2024
ISBN-13

9789360860165

ISBN-10 9360860166
Binding

Paperback

Number of Pages 96 Pages
Language (Hindi)
Dimensions (Cms) 20 X 13 X 1
Subject

Poetry

जसिंता केरकेट्टा की ये कविताएँ, जैसा कि स्वाभाविक है, उस प्रेम की कविताएँ नहीं हैं, जो केवल दो व्यक्तियों के बीच होता है, ये कविताएँ उस प्रेम पर केन्द्रित हैं जिससे समग्र सृष्टि को संबल मिलता है। वह प्रेम जो मनुष्य का प्रकृति से है, वह प्रेम जो प्रकृति बिना किसी प्रतिसाद की कामना के समूची मानवता को देती है! ये कविताएँ उस क्षुद्रता को भी सम्बोधित हैं, जिसका प्रदर्शन हम प्रकृति के उस प्रेम का अन्यायपूर्ण बँटवारा करके करते हैं।


जसिंता ने बहैसियत कवि और बहैसियत व्यक्ति इस प्रेम के वैभव को बहुत नज़दीक से देखा और आत्मसात किया है; इसी प्रेम के चलते उन्होंने आदिवासी जन की पीड़ा और प्रकृति के आर्तनाद को अपनी कविता में लगातार जगह दी है। प्रेम क्यों नहीं बहुतों से हो सकता है? बहुत सारे लोगों, बहुत सारे बच्चों, ​स्त्रियों, पेड़-पौधों, नदी, झरनों, पहाड़ों और पूरी धरती से? वे सही ही पूछती हैं।


इस संग्रह में निसन्देह कुछ कविताओं में हमें वह प्रेम भी मिलता है; जो दो व्यक्तियों के बीच होता है। लेकिन इसे भी देखने का उनका नज़रिया वही नहीं है, जो सबके लिए सामान्य है। इसीलिए वे ये पंक्तियाँ लिख पाती हैं : प्रेम में आदमी/क्यों एक हो जाना चाहता है?/अपनी भिन्नता के साथ/क्यों दो नहीं रह पाता?—और इस प्रश्न का समाहार वे वर्तमान के एक बड़े फलक पर ले जाकर करती हैं : इधर देश के प्रेम में कुछ लोग/सबको ‘एक’ कर देना चाहते हैं/जो ‘एक’ न हो पाए, वे मारे जाते हैं।


प्रेम का अर्थ ‘क़ब्ज़ा’ नहीं होता/न किसी की देह, न ख़ुशियों, न सपनों पर—इन पंक्तियों को हम इस कविता-संग्रह का एकाग्र मंतव्य कह सकते हैं, जिसका विस्तार एक व्यक्ति से लेकर प्रकृति के विराट तक है।

Jacinta Kerketta

जसिंता केरकेट्टा का जन्म 1983 में झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम ज़िले के खुदपोस गाँव में हुआ। इनका पहला हिन्दी-इंग्लिश द्विभाषिक काव्य-संग्रह ‘अंगोर’ का अनुवाद जर्मन, इतालवी और फ़्रेंच भाषाओं में प्रकाशित हुआ। दूसरा हिन्दी-इंग्लिश द्विभाषिक काव्य-संग्रह ‘जड़ों की ज़मीन’ का अनुवाद अंग्रेज़ी और जर्मन भाषा में प्रका‌शित हुआ। ‘ईश्वर और बाज़ार’ तीसरा काव्य-संग्रह है। सम्मान : एशिया इंडिजिनस पीपुल्स पैक्ट, थाईलैंड की ओर से इंडिजिनस वॉयस ऑफ़ एशिया का ‘रिकॅग्निशन अवॉर्ड’, ‘यूएनडीपी फ़ेलोशिप’, ‘प्रेरणा सम्मान’, ‘रविशंकर उपाध्याय स्मृति युवा कविता पुरस्कार’, ‘अपराजिता सम्मान’, ‘जनकवि मुकुटबिहारी सरोज सम्मान’ से सम्मानित। ‘वेणु गोपाल स्मृति सम्मान’ और ‘डॉ. रामदयाल मुंडा स्मृति सम्मान’ के लिए चयनित। संप्रति : वर्तमान में स्वतंत्र पत्रकारिता के साथ झारखंड के आदिवासी गाँवों में सामाजिक कार्य और कविता सृजन।
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