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| Publisher | Yuvaan Books |
| ISBN-13 | 9788169235402 |
| ISBN-10 | 8169235405 |
| Binding | Paperback |
| Edition | 2026 |
| Number of Pages | 360 Pages |
| Language | (Hindi) |
| Subject | Sociology |
‘संविधान सभा में आदिवासी’ यह किताब साबित करती है कि आदिवासियों ने सारी लड़ाइयाँ सिर्फ़ तीर और कमान से नहीं लड़ीं, बल्कि कई ज़रूरी लड़ाइयाँ उन्होंने सामुदायिक अपने और ज्ञान के दम पर जीतीं। डॉ. जितेंद्र मीणा अपनी इस किताब में दिखाते हैं कि आदिवासी नेताओं ने अपनी प्रतिभा के बल पर अपने समाज के लिए संवैधानिक संरक्षण हासिल करने के साथ ही साथ संविधान में बराबरी और न्याय की धारणा को गहराई से प्रभावित किया। लेकिन हमारा इतिहास इसे हासिए पर भी दर्ज करने लायक नहीं समझता! इन नायकों की उपेक्षा का कोई कारण तो होगा? डॉ. जितेंद्र मीणा इतिहास के पन्नों से उपनिवेशवादी और वर्चस्ववादी पर्दों को हटाकर आदिवासियों के अतीत को स्वायत्त रूप में देखने और उसकी पुनर्रचना करने को अपनी सामाजिक ज़िम्मेदारी मानते हैं। उनका मानना है कि किसी समुदाय के इतिहास को उपनिवेश इसलिए बनाया जाता है ताकि भविष्य की पीढ़ियों को गुलाम रखा जा सके। उनकी पहली पुस्तक ‘राष्ट्र निर्माण में आदिवासी’ हिंदी में बेस्टसेलर रही थी और एकाधिक भारतीय भाषाओं में अनूदित हो चुकी है।
यह किताब संविधान सभा में आदिवासी प्रतिनिधियों की भूमिका के साथ पूरी सभा का चलचित्र लगती है। उसके भीतर चल रहे घात-प्रतिघात साफ़ दिखाई पड़ने लगते हैं।
किताब की भाषा बहुत पठनीय है और इसमें अनेक महत्त्वपूर्ण आदिवासी प्रतिनिधियों का रेखांकन पहली बार देखने को मिलेगा।
Dr. Jitendra Meena
Yuvaan Books