Sapanon Ke Side Effects

Author :

Sanjay Chhel

Publisher:

Vani Prakashan

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Publisher

Vani Prakashan

Publication Year 2026
ISBN-13

9789373481760

ISBN-10 9373481762
Binding

Paperback

Number of Pages 200 Pages
Language (Hindi)
Weight (grms) 250

संजय छेल को लिखते हुए और उनके लिखे को स्क्रीन पर देखते मैं पिछले दो-ढाई दशकों से गहरी उत्सुकता और कुछ-कुछ आश्चर्यमिश्रित स्पृहा के साथ उसके जीवन के बारे में सोचता रहा हूँ। वे सिर्फ़ प्रिंट, पुस्तक, पत्रिकाओं तक सिमट जाने वाले लेखक नहीं। विधाएँ उन्हें कहीं किसी एक ख़ास जगह स्थिर नहीं कर पातीं। फ़िल्म, वृत्तचित्र, टेलीविज़न शो, सीरियल्स, अख़बार। उनका दायरा बड़ा, विविध और अनिर्धारित है लेकिन सबसे महत्त्वपूर्ण है उनके भीतर अपने लिखे और रचे को लेकर एक गहरा संशय। एक तरह की आत्मविश्वास-हीनता। और यही वह बिन्दु है जो उन्हें लगातार कुछ और लिखने-रचने को उकसाता रहता है और अपने समय के लेखकों में बतौर उन्हें विश्वसनीय भी बनाता है। मेले की भगदड़ में खोया हुआ एक ऐसा बच्चा जो न सिर्फ़ अपनी माँ को खोजता है, बल्कि उस कोख या गर्भ की तलाश में बेचैन है, जहाँ से कथाएँ जन्म लेती हैं, वे कथाएँ, जो स्वयं कथाकार के जन्म का स्थल हैं। प्रचलित कहानियों का कोई अभ्यस्त पाठक अगर संजय छेल की कहानियों की ऊपरी सतह पर ठहर जाये तो उसे वहाँ एक निडर, बेपरवाह, बेलौस और वाचाल कथाकार मिलेगा। हर कुछ पर टिप्पणी... मनोरंजन-सा कुछ करता हुआ। आस-पड़ोस का एक कोई आत्मीय क़िस्सागो। इर्द-गिर्द घटित हो रहीं आमफ़हम ज़िन्दगी की रोज़मर्रा की ऐसी घटनाएँ, जो इसलिए अनदेखा छूट जाती हैं क्योंकि वे बहुतायत में हैं, क्योंकि समय और स्थान में उनकी उपस्थिति आम है, संजय उन्हीं का औचक बयान करने लगते हैं। ब्योरे या तफ़सील के साथ, अपने में बाँध लेने वाला वृत्तान्त। कथाकार के आत्मसंशय के बावजूद कोई आत्मश्लाघा या आत्ममुग्धता नहीं, जो मुख्यधारा हिन्दी के अधिकतर लेखकों का स्वभाव है, बल्कि उसकी जगह एक बिन्दास खुलापन, एक पारदर्शी उत्साह, सब कुछ कह डालने की बेताबी से भरी हुई ऊर्जा। समय के हाल और अहवाल का नैरेशन। लेकिन कुछ ही देर में वही कहानी अचानक स्तब्ध कर देती है। बतकही के भीतर एक ऐसा सच, जो कभी मंटो, बर्टोल्ड ब्रेख़्त, फ्रेंज़ फेनन, जेम्स बाल्डविन, असग़र वजाहत और राजेन्द्र सिंह बेदी की कहानियों-उपन्यासों में दिखता है। ‘सफ़ेद हाशिए’, ‘बॉडी काउंट’ और ‘मैनिक्विन’ जैसी कहानियाँ विभाजन के बाद भी आज तक निरन्तर जारी सामाजिक सामुदायिक-साम्प्रदायिक विभाजन और उनकी हिंसक टकराहट के भयावने, मार्मिक और चिन्ताजनक अमानवीय चौतरफ़ा व्याप्त सच को एक कौंध के साथ सामने उघाड़कर रख देती हैं। नये साल 2026 में संजय छेल के इस कहानी-संग्रह के लिए ढेरों शुभकामनाएँ। —उदय प्रकाश

Sanjay Chhel

संजय छेल हिन्दी सिनेमा-साहित्य और अख़बार जगत् के बहुआयामी व्यक्तित्व हैं। ‘रंगीला’, ‘यस बॉस’, ‘फिर भी दिल है हिन्दुस्तानी’, ‘पार्टनर’, ‘दिल तो बच्चा है जी’, ‘इन्दु सरकार’, ‘हेलो’ (नेशनल एवार्ड, 1998) जैसी 30 सफल हिन्दी फ़िल्मों का लेखन एवं ‘ख़ूबसूरत’ (1999) जैसी 4 फ़िल्मों का लेखन-निर्देशन किया है, अनेक लोकप्रिय फ़िल्मों में गीत रचे हैं। ‘नुक्कड़’, ‘फ़िल्मी चक्कर’, ‘हिटलर दीदी’, ‘ये उन दिनों की बात है’ जैसे कई धारावाहिकों के 2500 से अधिक एपिसोड्स और ‘द सिक्रेट ऑफ़ शिलदार’ जैसी वेब-सीरीज़ लिखी है। उनकी कई हिन्दी कहानियाँ ‘हंस’, ‘जनसत्ता’ जैसे प्रकाशनों में एवं ‘जानकीपुल’ जैसे साहित्यिक माध्यमों में सराही जा चुकी हैं। उनके गुजराती कहानी-संग्रह ‘पोस्टर’ और निबन्ध-संग्रह ‘गमता चेहरा’ को महाराष्ट्र साहित्य अकादमी द्वारा 2023 में प्रथम पुरस्कार से नवाज़ा जा चुका है। उनकी रचनाएँ उर्दू-मराठी, अंग्रेज़ी भाषाओं में अनूदित हो चुकी हैं। सदाबहार हिन्दी व्यंग्यकार शरद जोशी के 200 व्यंग्य लेखों का उन्होंने गुजराती अनुवाद किया है, जो ‘शरद जोशी स्पीकिंग’ और ‘शरद जोशीनी हास्ययात्रा’ नामक 2 पुस्तकों में 2025 में संग्रहित हुए हैं। 2009 से अब तक अविरत ‘अन्दाज़-ए-बयाँ’ और ‘राग बिन्दास’ जैसे लोकप्रिय और चर्चित कॉलम का लेखन, गुजराती के ‘दिव्य भास्कर’, ‘मुम्बई समाचार’ और ‘गुजरात मित्र’ जैसे प्रमुख अख़बारों में चल रहा है। देश की प्रमुख आर्ट गैलेरीज़ में उनके मूर्त-अमूर्त आधुनिक चित्रों की प्रदर्शनी भी हुई है।
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