Vinay Patrika

Author :

Tulsidass

Publisher:

LOKBHARTI PRAKASHAN

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Publisher

LOKBHARTI PRAKASHAN

Publication Year 2009
ISBN-13

9788180314032

ISBN-10 8180314030
Binding

Hardcover

Number of Pages 353 Pages
Language (Hindi)
Dimensions (Cms) 22 X 14.5 X 2
आत्म निवेदन का सीधा सम्बन्ध अन्तःकरण के आयतन से है। इस तरह की रचनाओं में आत्म-संवाद झलकता है। सम्पूर्ण हिन्दी साहित्य के इतिहास में तुलसीदास की ‘विनय पत्रिका’ और निराला की ‘अणिमा’ से लेकर ‘सांध्‍यकाकली’ तक की रचनाओं में यह स्वर विशेष रूप से सुनाई पड़ता है। अन्तर्मुखी होकर किया गया आत्मविश्लेषण, अन्तर्द्वन्द्वों की गहराई, निर्भय होकर की गई आत्म-समीक्षा और सामाजिकता इन रचनाओं को अपने युग का प्रतिनिधित्व प्रदान करती हैं। तुलसीदास के ‘हौं’ और निराला के ‘मैं’ की प्रकृति, घनत्व और आत्मविस्तार का धरातल उन्हें भिन्न कालखंडों में भी समानधर्मा बनाता है—‘उत्पस्यते तु मम कोऽपि समानधर्मा, कालो ह्यं निरवधिर्विपुला च पृथ्वी’। ‘विनय पत्रिका’ और निराला की परवर्ती रचनाओं में अभिव्यक्त विनय-भावना कपोल कल्पना या आत्म-प्रवंचना नहीं है। यह दोनों कवियों के जीवन की गाढ़ी कमाई और सर्जनात्मक उपलब्धि है। दार्शनिक स्तर पर जीवन-जगत के प्रति द्वन्द्वात्मक अन्तर्दृष्टि एवं ‘अखिल कारुणिक मंगल’ के प्रसार की कामना ने भक्ति का साधारणीकरण कर दिया है। तुलसीदास का ‘हौं’ एवं निराला का ‘मैं’, अपने समाज से अन्तःक्रिया करते हुए बना है। आत्म-मुक्ति आत्म-प्रसार की भावना से अविच्छिन्न है। दोनों की विनय भावना का अन्त न तो भाग्यवाद में होता है और न ही निराशा में। इस दृष्टि से ‘विनय पत्रिका’ का अन्तिम पद और निराला की अन्तिम रचना सहज तुलनीय है।

Tulsidass

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