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Aadividrohi Tilka Manjhi

Author :

Ghanshyam

Publisher:

Vani Prakashan

Rs239 Rs299 20% OFF

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Publisher

Vani Prakashan

Publication Year 2025
ISBN-13

9789362876430

ISBN-10 9362876434
Binding

Hardcover

Number of Pages 100 Pages
Language (Hindi)
Weight (grms) 300
Subject

Historical Fiction

"तिलका माँझी एक ऐतिहासिक पात्र है। ऐतिहासिक पात्रों को जब कथा का विषय बनाया जाता है, तब लेखक के हाथ-पाँव काफी बँधे होते हैं। साक्ष्य के अभाव में उन्हें कई प्रकार की कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। तिलका माँझी की कथा की रचना-प्रक्रिया के सम्बन्ध में लेखक ने अपनी इस लाचारी का बयान किया है, “मशहूर लेखिका महाश्वेता देवी ने तिलका बाबा को सन्थाल समुदाय का बतलाया है। जबकि अधिकांश लेखकों ने तिलका बाबा को ज़बरा पहाड़िया के रूप में चिह्नित किया है। ...दस्तावेज़ के अभाव में एक लेखक कितना लाचार हो जाता है—यह तिलका बाबा की कथा ने साबित कर दिया।"" लेखक के अनुसार, “तिलका बाबा राजमहल की पहाड़ियों के बीच बसे तिलकपुर गाँव के रहने वाले थे। उनका नाम ज़बरा पहाड़िया था । ज़बरा पहाड़िया की आँखें बड़ी-बड़ी थीं। इस तरह की आँख वाले को पहाड़िया भाषा में तिलका कहा जाता है, सो ज़बरा पहाड़िया को घर-घर में तिलका कहकर पुकारा जाने लगा। ...दस्तावेज़ों में तिलका शब्द नहीं मिलता, लेकिन ज़बरा पहाड़िया शब्द मिलता है। यह आज भी विवाद का विषय बना हुआ है कि तिलका बाबा सन्थाल थे या पहाड़िया। कुछ लोग अभी भी तिलका माँझी को सन्थाल मानते हैं।” ★★★ तिलका माँझी क्लीवलैंड को आदिवासियों की शक्ति का एहसास कराना चाहते थे क्लीवलैंड आहत हो गया और इंग्लैंड ले जाने थे, लेकिन ना चाहते हुए भी युद्ध के क्रम में जहाज़ पर ही उनकी मृत्यु हो गयी। क्लीवलैंड के बाद आयरकूट ने कमान सँभाली। आयरकूट और जाऊरा की अगुवाई में 1200 हिल रेंजर्स और सौ बन्दूकधारी निकल पड़े। दूसरी ओर तिलका बाबा की तैयारी भी पक्की थी। “तिलका बाबा का रौद्र रूप देख सभी हतप्रभ थे। उन्होंने कुल्हाड़ी अपनी कमर में कसी। तीर के तूणीर को दाहिने कन्धे पर लटकाया और धनुष को बायें कन्धे पर सहेज निकल पड़ा यह रणबांकुरा। ...तीतापानी की पहाड़ियों पर चारों तरफ़ से हूल, हूल, हूल के नारे गूँजने लगे। इस गगनचुम्बी आवाज़ को सुनकर आँखें मलते हुए आयरकूट उठा ही था कि सनसनाते हुए एक पत्थर ने कहा, 'स्वागत है आयरकूट !' ठीक इसी बीच एक तीर उसकी बायीं बाँह में समा गया।” यह एक निर्णायक युद्ध साबित हुआ। ज़ख़्मी हालत में तिलका बाबा पकड़ लिए गये। उन्हें चार घोड़ों के बीच रस्से से बाँध घसीटा जाने लगा। घोड़े जब रुकते तब बाबा थोड़ी गम्भीर साँस लेते। एक तो वे घायल थे। उनकी जाँघ में तीर लगा था, जाँघ बुरी तरह लहूलुहान थी। दूसरे घसीटे जाने के कारण पूरा शरीर क्षत-विक्षत था। घोड़े के रुकते ही बाबा सिंगबोंगा को निहारते। मन ही मन बुदबुदाते। मानो मन ही मन सिंगबोंगा से कह रहे हों कि मैंने तो तुम्हारी धरोहरों की रक्षा में कोई कोताही नहीं की। मैंने एक ऐसी पीढ़ी तैयार कर दी है जो फिरंगियों को चैन की नींद सोने नहीं देगी। इसलिए, अब कोई मलाल नहीं कि मैं रहूँ या न रहूँ। नयी पीढ़ी इस हूल को आगे ले जायेंगी। - इसी पुस्तक से "

Ghanshyam

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