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Aadmi

Author :

Firaque Gorakhpuri

Publisher:

Vani Prakashan

Rs170 Rs200 15% OFF

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Publisher

Vani Prakashan

Publication Year 2012
ISBN-13

9788170555520

ISBN-10 8170555523
Binding

Hardcover

Number of Pages 80 Pages
Language (Hindi)
Weight (grms) 300
Subject

Plays

आदमी हिन्दी अनुवाद है उस प्रलयात्मक जर्मन नाटक का जिसके कथानक में, पात्रों में, संवादों में, दृश्यों में जीवन के कम्पनों की गड़गड़ाहट सुनाई देती है। बन्दीघर में तेज़ चढ़ते हुए बुखार की अवस्था में लेखक ने यह नाटक लिखना आरम्भ किया और उस समय समाप्त किया जब क़लम उसकी जलती हुई शक्तिहीन उँगलियों से छूट कर गिर पड़ी। यह नाटक साधारण से साधारण पाठक के मन व मस्तिष्क को उच्च से उच्च और गम्भीर से गम्भीर बना देता है। साधारण व्यक्ति को उच्चतम साहित्य से आनन्दित और प्रभावित अवसर प्रदान करता है। इस नाटक में शक्ति और गुण हैं ......

Firaque Gorakhpuri

फ़िराक़ गोरखपुरी उर्दू साहित्य के महान शायर, आलोचक और शिक्षाविद् थे। उनका जन्म 28 अगस्त 1896 को उ.प्र. के गोरखपुर में हुआ था। उनका मूल नाम रघुपति सहाय था। उनके पिता मुंशी गोरख प्रसाद ‘इबरत’ प्रतिष्ठित वकील और साहित्य-प्रेमी व्यक्ति थे। पिता की साहित्यिक रुचि और संस्कारों का प्रभाव फ़िराक़ के व्यक्तित्व और रचनात्मक जीवन पर गहराई से पड़ा। फ़िराक़ ने प्रारम्भिक शिक्षा के बाद एफ.ए. म्योर सेंट्रल कॉलेज, इलाहाबाद से उच्च शिक्षा प्राप्त की। 1917 में उन्होंने भारतीय सिविल सेवा (आई. सी. एस.) की परीक्षा में सफलता प्राप्त की और डिप्टी कलक्टर के पद के लिए चुने गये। लेकिन देश के स्वतन्त्रता आन्दोलन से प्रभावित होकर 1918 में उन्होंने सरकारी नौकरी से त्यागपत्र दे दिया। इसके बाद वे राष्ट्रीय आन्दोलन से जुड़े और साहित्य तथा समाज-सेवा को अपना उद्देश्य बनाया। 1920 के दशक में फ़िराक़ का साहित्यिक जीवन पूरी तरह सक्रिय हुआ। वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से जुड़े और स्वतन्त्रता आन्दोलन में भाग लिया। दिसम्बर 1920 में प्रिंस ऑफ़ वेल्स के भारत आगमन के विरोध में आन्दोलन के दौरान उन्होंने कई महत्त्वपूर्ण साहित्यिक रचनाएँ कीं जिससे उनकी रचनात्मक प्रतिभा को नयी दिशा मिली। फ़िराक़ केवल शायर ही नहीं, बल्कि एक गहन चिन्तक भी थे। उन्होंने 1927 में लखनऊ के क्रिश्चियन कॉलेज में अध्यापन कार्य प्रारम्भ किया और बाद में कानपुर के बी.एन.एस.डी. कॉलेज में अंग्रेज़ी और उर्दू के प्राध्यापक रहे। 1930 में उन्होंने आगरा विश्वविद्यालय से अंग्रेज़ी में एम. ए. में प्रथम स्थान प्राप्त किया। इसके बाद वे इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अंग्रेज़ी के प्राध्यापक नियुक्त हुए और लम्बे समय तक अपनी विद्वत्ता तथा अध्यापन-कौशल से विद्यार्थियों को प्रभावित करते रहे। 1959 में वे विश्वविद्यालय सेवा से अवकाश प्राप्त हुए। फ़िराक़ गोरखपुरी का साहित्यिक योगदान अत्यन्त व्यापक है। उन्होंने उर्दू ग़ज़ल को नयी संवेदना, आधुनिक दृष्टि और मानवीय भावनाओं से समृद्ध किया। वे साहित्य अकादेमी के फ़ेलो भी निर्वाचित हुए। फ़िराक़ गोरखपुरी को उनके उर्दू काव्य-संग्रह ‘गुल-ए-नग़्मा’ के लिए वर्ष 1960 में ‘साहित्य अकादमी’ पुरस्कार प्राप्त हुआ। इसके अतिरिक्त साहित्य और शिक्षा के क्षेत्र में इनके विशिष्ट योगदान के लिए भारत सरकार ने 1968 में उन्हें ‘पद‍्म भूषण’ से सम्मानित किया। वर्ष 1981 में उर्दू साहित्य में उनके समग्र अवदान के लिए उन्हें प्रतिष्ठित ‘ग़ालिब पुरस्कार’ से नवाज़ा गया। 3 मार्च 1982 को फ़िराक़ गोरखपुरी का निधन हुआ। लेकिन उनकी रचनाएँ आज भी उर्दू साहित्य की अमूल्य निधि के रूप में जीवित हैं। वे भारतीय साहित्य के उन महान रचनाकारों में हैं, जिन्होंने अपनी लेखनी से भाषा की सीमाओं को पार कर मानवता और संवेदना का परिचय दिया।
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