Buy Cough, Pitta, Vaat Aur Aapka Swasthya, 9789373484945 at Best Price Online - Buy Books India

Cough, Pitta, Vaat Aur Aapka Swasthya

Author :

Premshankar Pandey

Publisher:

VANI PRAKSHAN

Rs251 Rs295 15% OFF

Availability: Available

Shipping-Time: Usually Ships 1-3 Days

    

Rating and Reviews

0.0 / 5

5
0%
0

4
0%
0

3
0%
0

2
0%
0

1
0%
0
Publisher

VANI PRAKSHAN

Publication Year 2026
ISBN-13

9789373484945

ISBN-10 937348494X
Binding

Hardcover

Number of Pages 94 Pages
Language (Hindi)
Weight (grms) 150
Subject

Healthy Living & Wellness

दूरसंचार विभाग से सहायक अभियन्ता के पद से 32 वर्ष पहले सेवा निवृत्त हुआ था। व्यस्त रहने के लिए एक्यूप्रेशर संस्थान से एडवान्स कोर्स किया। उसके बाद जिज्ञासा हुई कि आयुर्वेद में त्रिदोष शब्द का प्रयोग होता है, यह त्रिदोष है क्या? इसी जिज्ञासा को शान्त करने के लिए अपनी भारतीय चिकित्सा के बारे में जानकारी प्राप्त की और उसे पुस्तक रूप देने का यह प्रयत्न है। पुस्तक में एक रोग के कई उपाय बताये गये हैं। पाठक अपनी सुविधानुसार तथा सामग्री उपलब्धता के अनुसार कोई एक या दो उपाय अपना सकते हैं। उद्देश्य है कि छोटी-छोटी व्याधियों के लिए लोग महँगी दवाओं के लिए न भागें।

Premshankar Pandey

प्रेमशंकर पाण्डेय का जन्म कानपुर में 1935 में हुआ। पिता सेना में थे अत: दूर-दूर स्थानान्तरण होते रहे। प्रारम्भिक शिक्षा रावलपिण्डी के कॉन्वेंट स्कूल से। पर तीन माह के बाद ही स्थानान्तरण के कारण मदरसे में रावलपिण्डी में ही दाख़िला लिया। बाद में रुड़की में प्राइमरी स्कूल, फिर वाराणसी के प्राइमरी स्कूल में पढ़ाई की। अन्त में कक्षा 5 से बी.एससी. प्रथम वर्ष तक शिक्षा प्राप्त की। केन्द्रीय सेवाओं में चयनित होने से बी.एससी. पूरी न हो सकी और 6 वर्ष की सेवा के बाद सरकारी अनुमति प्राप्त कर बी.ए. किया। इसी बीच विभागीय परीक्षाएँ देते हुए सहायक अभियन्ता पद तक पहुँच कर दूरसंचार विभाग से 1993 में सेवानिवृत्त। सेवानिवृत्ति के बाद ख़ाली न बैठूँ यह विचार आया और प्रयागराज में ही एक्यूप्रेशर का एडवांस कोर्स किया। गत 70 वर्षों से प्रयागराज का ही होकर रह गया। जिज्ञासु मन कुछ न कुछ करने को प्रेरित करता रहा है। मन में आया कि क्यों न अपनी भारतीय चिकित्सा पद्धति के बारे में जाना जाय। त्रिदोष शब्द का प्रयोग आयुर्वेद में बहुत होता आया है अत: इसी ओर ध्यान मुड़ गया और फलस्वरूप यह पुस्तक आपके सामने है। छोटी-छोटी व्याधियों के लिए महँगी दवाओं की ओर क्यों भागें। क्यों बीमार पड़ें। यह बात मन में आयी और निष्कर्ष पर पहुँचा कि यदि हम नियमित दिनचर्या अपनाएँ, सही भोजन ग्रहण करें ताकि हमारे कफ, पित्त और वात सन्तुलित रहें तो हम बीमार नहीं पड़ेंगे। हाँ आयु सम्बन्धी व्याधियाँ तो आयेंगी ही पर उन्हें नियन्त्रण में रखा जा सकता है और कष्टसाध्य स्थिति से बचा जा सकता है। यही उद्देश्य है इस पुस्तक का। पाठकगणों से निवेदन कि वह अपने अनुभव साझा करते रहें। त्रुटियाँ देखें तो सुझाव दें। जिज्ञासु बने रहें।
No Review Found
Similar Books
More from Author