| Publisher |
HIND YUGM |
| Publication Year |
2021 |
| ISBN-13 |
9788195106394 |
| ISBN-10 |
8195106390 |
| Binding |
Paperback |
| Edition |
2nd |
| Number of Pages |
208 Pages |
| Language |
(Hindi) |
| Subject |
Comics, Mangas & Graphic Novels |
जब से इस धरा पर जीव हैं, इतिहास साक्षी है तभी से ‘जिसकी लाठी, उसकी भैंस’ सबसे महत्वपूर्ण और प्रभावशाली सिद्धांत के रूप में लागू है। बस ‘लाठी’ और ‘भैंस’ के स्वरूप बदलते रहे हैं। वर्तमान समय में विश्व में कीमती संसाधनों पर अधिकार करने की लड़ाई जारी है। शीत युद्ध, तेल के लिए खाड़ी देशों की लड़ाई इत्यादि इसके उदाहरण हैं। पराधीनता का स्तर अब भौतिक नहीं, आर्थिक और वैचारिक हो गया है। ‘लाठी’ के रूप में है टेक्नोलॉजी और अर्थशक्ति। क्रियान्वयन का तरीका हो गया है जासूसी और गुप्त ऑपरेशन। मई, 1998 में भारत ने परमाणु विस्फोट कर सारे विश्व को स्तब्ध कर दिया था। इस घटना से सबसे ज्यादा जो बौखलाया, वह था- चीन। इसके पहले तक भूमंडल के 200 के लगभग देशों में केवल 5 सुपर पॉवर थे, अब भारत छठा हो गया था। इतना ही नहीं, एशिया के लगभग 50 देशों में अब तक केवल चीन ही सुपर पॉवर था, अब भारत भी हो गया था। 20वीं सदी के अंत तक, विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में तमाम यूरोपीय राष्ट्रों को भारी अंतर से पछाड़कर, चीन दूसरे नंबर पर आ गया था। उसके आगे अब एक ही अजेय दुर्ग बचा था, ‘अमेरिका’, जिसके पीछे वह अपनी सारी टेक्नोलॉजी और ख़ुफ़िया शक्ति लगा चुका था। अंतर कम करने के 2 तरीके होते हैं—पहला, स्वयं तेजी से बढ़ना, दूसरा, विरोधी को रोक लेना या पीछे धकेल देना। वह दोनों ही तरीके आजमा रहा था। अंतरराष्ट्रीय भू-राजनैतिक समीकरण में प्रत्यक्ष से ज्यादा खम-पेंच परोक्ष लड़ाए जाते हैं। उनका क्रियान्वयन आसान तथा किफायती होता है और उनके परिणाम भी बहुत आकर्षक होते हैं। परमाणु विस्फोट के तुरंत बाद ही चीन चेता और उसने अपना वर्चस्व बचाने के लिए छद्म रूप से भारत में ऑपरेशन आरंभ कर दिया। उसे भारत को पीछे धकेलना था। इस काम के लिए उसकी ख़ुफ़िया एजेंसी ने 4 प्रशिक्षित अफ़सर भारत में प्लांट किए, जो अगले 2 दशकों तक किस तरह सांस्कृतिक, वैचारिक, राजनैतिक, धार्मिक, विज्ञान, टेक्नोलॉजी और रक्षा के कैनवास पर फैलकर, इन्हें अंदर ही अंदर कमजोर करके राष्ट्र को कमजोर करते हैं और अंत में किस तरह पकड़े जाते हैं, यह कहानी है ‘ड्रैगन्स गेम’ की।.
Ranvijay
गद्य के विस्तीर्ण परंतु शिला समान धरातल पर, वर्तमान में कुछ जो नए पौधे वृक्ष बनने को आतुर हैं, उनमें से एक हैं –रणविजय। अब तक छपे अपने दो कहानी-संग्रहों ‘दर्द मांजता है…’ और ‘दिल है छोटा-सा’ से उन्होंने अपने पाठकों के मन में रणविजय के लेखन को और अन्वेषित करने की चाह जगाई है। एक लेखक के रूप में रणविजय अपनी कला और कथ्य के लिए सजग हैं। वे अपनी रचनाओं में लगातार विषय एवं संवेदनाएँ परिवर्तित करते जा रहे हैं, जो उनके लेखन के ही फलक मात्र को विस्तार नहीं देते वरन पाठकों को भी कुछ नया प्राप्त होता है। प्रस्तुत कृति उनका पहला उपन्यास है। यह उपन्यास ज़्यादातर वास्तविक घटनाओं को कल्पनाओं से जोड़कर बुना गया है, जो बहुत कुछ सोचने को मजबूर करता है। यह पाठक को अपने आसपास हो रहे अलक्ष्य परिवर्तनों के प्रति न केवल सशंकित करता है, अपितु उन्हें सचेत दृष्टि रखने के लिए जागरूक भी करता है। इसमें वर्णित दाँव-पेंच, पर्दे के पीछे होने वाली घटनाएँ हैं। अपनी ख़ुफ़िया संस्थाओं एवं उनके ऑपरेशनों पर आधुनिक राष्ट्र बहुत सारा धन क्यों ख़र्च करते हैं तथा क्यों होना चाहिए जैसे विषयों पर समझ बनाने में यह किताब मदद करती है।.
Ranvijay
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