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| Publisher | Rajkamal Prakashan |
| Publication Year | 2023 |
| ISBN-13 | 9788119028498 |
| ISBN-10 | 811902849X |
| Binding | Paperback |
| Edition | 1st |
| Number of Pages | 168 Pages |
| Language | (Hindi) |
| Dimensions (Cms) | 22X14X1.5 |
| Weight (grms) | 162 |
| Subject | Poetry |
पंकज चतुर्वेदी की कविता उन पाठकों के दिल के बहुत क़रीब रहती है, जो समझते हैं कि कविता का सबसे ज़रूरी काम भाषा में अर्थ के जनसंहार को विफल करना है। सभी तरह की आततायी सत्ताएँ इस जनसंहार की हिस्सेदार होती हैं। भाषा को जुमलेबाज़ी में घसीटकर लोकतंत्र को भीड़तंत्र में बदला जा सकता है। विनाश को विकास की तरह दिखाया जा सकता है। अन्याय को न्याय की आभा दी जा सकती है। जनसंहार को राष्ट्रीय गौरव के अभिसार में बदला जा सकता है। झूठ को सच बनाया जा सकता है। कविता इस प्रपंच को उजागर कर शब्दों के सच्चे अर्थों का पुनर्जन्म घटित करती है।रघुवीर सहाय की कविता ने इस ज़िम्मेदारी को बख़ूबी निभाया। उन्होंने देखा था कि शासक जब 'लोकतंत्र का अन्तिम क्षण है' कहकर हँसते हैं, तब वे लोकतंत्र के अर्थ का ही अन्त नहीं करते, हँसी को भी हत्या के उल्लास में बदल देते हैं। पंकज की कविता देख रही है कि नेता जब कहता है 'देश के लिए जी रहा हूँ', तब उसकी मुराद यह होती है कि उसके जीने में ही देश का जीना समझा जाए! पंकज की कविता में दर्ज है कि आज असहमति को दबोचती हुई मुस्कान हिंसा के नहीं, मेहरबानी के रूप में प्रकट हो रही है। यह विफल लोकतंत्र का नहीं, फ़ासीवाद के उत्थान का लक्षण है। रघुवीर सहाय से पंकज चतुर्वेदी तक हिन्दी कविता की यात्रा लोकतंत्र के अन्तिम क्षण से फ़ासीवाद के पहले क्षण तक की यात्रा है। खुली सड़क पर पूर्व-घोषित हत्या के कातर तमाशबीन अब सिर्फ़ तमाशा नहीं देखते, हत्यारों की जय-जयकार भी करते हैं।भाषा के हर पाखंड को उजागर करने की ज़िद में पंकज की कविता, कविता जैसी न दिखने की हद तक कविता के आडम्बरों से परहेज़ करती है। दुस्साहस सरीखा यह साहस उनकी कविता को हमारे समय की सच्ची और पारदर्शी कविता होने की क़ुव्वत अदा करता है।—आशुतोष कुमार
Pankaj Chaturvedi
Rajkamal Prakashan