Buy Nadi Ki Gili Aankhen, 9789373487984 at Best Price Online - Buy Books India

Nadi Ki Gili Aankhen

Author :

Chitra Singh

Publisher:

VANI PRAKSHAN

Rs236 Rs295 20% OFF

Availability: Available

Shipping-Time: Usually Ships 1-3 Days

    

Rating and Reviews

0.0 / 5

5
0%
0

4
0%
0

3
0%
0

2
0%
0

1
0%
0
Publisher

VANI PRAKSHAN

Publication Year 2026
ISBN-13

9789373487984

ISBN-10 9373487981
Binding

Hardcover

Number of Pages 88 Pages
Language (Hindi)
Weight (grms) 250
Subject

Poetry

नदी की गीली आँखें चित्रा सिंह की कविताएँ बहुत कम शब्दों में बहुत कुछ को कह देने को आतुर हैं। कवि को लगता है कि वह बोले गये वाक्य के अर्थ कहीं रख कर भूल गयी है। इसलिए वाक्य में आये शब्द भारहीन होकर अन्तरिक्ष में तैर रहे, बिखर गये हैं और वो उसकी पहुँच से बाहर हो गये हैं। उसके सपनों के तालों की चाबियाँ सितारों के पास हैं और उनको देखने को वो आसमान की तरफ़ देखती है लेकिन उसे पता है कि सितारे कब किसकी झोली में आकर गिरते हैं। इन कविताओं में प्रकट-अप्रकट और उदासी और ख़ुशी का खेल और उनके बीच का द्वैत जीवन की ही तरह निरन्तर बने रहते हैं। ख़ुशी जब बाहर गुल्ली-डंडा खेल रही होती है उदासी सूनी तिजोरियों की चाबी खोज रही होती है। जब वह स्वयं भीतर होती है एक अप्रकट की छाया बाहर होती है। जो दिन के उगते ही पेड़ों की ओट में चला जाता है। लेकिन चिड़िया जानती है कि उसके सकोरों में दाना-पानी किसने रखा है। उसकी जेबों में कुछ खनक रहा है, उसको लगता है कि उसने मेरी हँसी को अब तक शायद सँभालकर रखा हो। उस अप्रकट के आने की प्रतीक्षा भी है। इन्तज़ार की एक लालटेन है जो दोनों के बीच निश्चित दूरी पर लटक रही है। ख़ुशी और उदासी का यह खेल उसके मन के कई कोनों-अँतरों को उजागर करता चलता है। मन में अतृप्त इच्छाओं के जो तहखाने हैं, उनकी धूलभरी सीढ़ियों पर वह नंगे पैरों चढ़ती-उतरती है। लेकिन वह इन इच्छाओं को अपनी प्रार्थना में शामिल नहीं करती। वह मज़बूती के साथ उन इच्छाओं का हाथ पकड़ कर किसी नदी या तालाब में सिरा देती है। वह चाहती है कि छाँव धूप से अपना हिस्सा माँगे। उदासी के चेहरे पर मुस्कान का स्वाद रहे। नाउम्मीदों को उम्मीद का सहारा मिले । अँधेरे उजालों से रोशनी में मिल सकें। चुप्पी घृणा के विरोध में हथियार की तरह खड़ी हो । जहाँ ज़रूरी हो वहाँ बोला जाये वरना हमारे समर्थन में खड़ा सच निहत्था मारा जायेगा। चित्रा सिंह की कविता एक कठिन समय में सच के पक्ष में बोलने की ज़रूरत को रेखांकित करती कविता है।

Chitra Singh

चित्रा सिंह जन्म : 1974, विदिशा (मध्यप्रदेश) शिक्षा : बरकतउल्लाह विश्वविद्यालय, भोपाल से रसायन शास्त्र में एम.एससी. तथा कार्बनिक रसायन (मेटेलिक सोप्स) पर पीएच.डी., कई शोध पत्र विज्ञान, रसायन शास्त्र, पर्यावरण शिक्षा एवं शिक्षा आदि विषयों में महत्त्वपूर्ण राष्ट्रीय तथा अन्तरराष्ट्रीय स्तर के जर्नल में प्रकाशित। आकाशवाणी तथा दूरदर्शन, भोपाल द्वारा शैक्षिक कार्यक्रमों में विषय विशेषज्ञ के रूप में निरन्तर भागीदारी। साहित्य अकादेमी नयी दिल्ली, म.प्र. साहित्य अकादमी, भारत भवन भोपाल, भारतीय भाषा परिषद् कलकत्ता, हिन्दवी, रचना समय सहित देश की सभी शीर्ष साहित्यिक संस्थाओं में काव्य पाठ एवं व्याख्यान। दैनिक भास्कर, नई दुनिया, दैनिक जागरण, हंस, वागर्थ, साक्षात्कार, समकालीन कविता, वसुधा, वस्तुतः, आदि पत्र-पत्रिकाओं में कविताएँ एवं लेख आदि प्रकाशित। देश के महत्त्वपूर्ण शैक्षणिक संस्थानों, विश्वविद्यालयों के राष्ट्रीय एवं अन्तरराष्ट्रीय संगोष्ठी में बीज वक्तव्य, अध्यक्षता एवं आलेख पाठ। प्रकाशित कृतियाँ : रेत में उगाये हैं फूल, धूप के नन्हे पाँव । पुस्तक सम्पादन : ‘Data-Driven Analytics for Healthcare 2025’, Apple Academic Press US. पुरस्कार एवं सम्मान : प्रसार भारती, नयी दिल्ली द्वारा शिक्षा के क्षेत्र में वर्ष-2012 से तीन वर्षों के लिए सलाहकार चुना गया। साहित्य के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण योगदान हेतु राष्ट्रीय साहित्य सुरभि अलंकरण वर्ष-2014। समाज में दिये गये उत्कृष्ट अवदान हेतु SISTEC Group Bhopal द्वारा अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस पर तेजोमय सम्मान से सम्मानित वर्ष-2023। स्कूल स्तर पर विज्ञान और तकनीक पर आधारित इम्पायर अवार्ड मानक में कई वर्षों से जूरी सदस्य के रूप में मनोनीत। सम्प्रति : प्राध्यापक (रसायन शास्त्र) एवं विभागाध्यक्ष, विस्तार शिक्षा विभाग, क्षेत्रीय शिक्षा संस्थान (एन.सी. ई.आर.टी.) भोपाल।
No Review Found
Similar Books
More from Author