| Publisher |
VANI PRAKSHAN |
| Publication Year |
2026 |
| ISBN-13 |
9789369449187 |
| ISBN-10 |
9369449183 |
| Binding |
Paperback |
| Number of Pages |
266 Pages |
| Language |
(Hindi) |
| Weight (grms) |
400 |
| Subject |
Poetry |
सीप के मोती किताब जैसा कि नाम से ध्वनित है, उर्दू शाइरी की क़रीब पाँच सौ वर्षों की समृद्ध परम्परा से चुने गये बहुमूल्य मोतियों का सुरुचिपूर्ण संचयन है। इसकी उपयोगिता एवं महत्त्व के अनेक आयाम हैं। हालाँकि इसमें शे'रों का चयन रचनाकालक्रमानुसार नहीं किया गया है, लेकिन इस चयन में उर्दू ग़ज़ल की तमाम रंगतों और लगभग सभी बाकमाल शाइरों की नुमाइंदगी का पूरा ख़याल रखा गया है। इन शे'रों से गुज़रते हुए पाठक उर्दू शाइरी के विकास की विभिन्न मंज़िलों की एक रूपरेखा अपने ज़ेहन में बना सकते हैं। विदित है कि 19वीं सदी के अन्त और 20वीं सदी के आरम्भ तक उर्दू शाइरी का इतिहास एक तरह से ग़ज़ल का ही इतिहास रहा है। इस तथ्य को समझने में यह किताब मददगार साबित होती है।
सांस्कृतिक दृष्टि से भी इस किताब का विशेष महत्त्व है, यह एक सच्चाई है कि देश विभाजन हुआ, लेकिन उर्दू ज़बान विभाजित नहीं हुई, इस ज़बान की रचनाशीलता अटूट और अविभाज्य बनी रही। फ़ैज़ जितने पाकिस्तान के शाइर हैं, उतने ही भारत के। कहानी विधा में यही बात मंटो को लेकर है। जब हम उर्दू शे'रो-अदब की बात करते हैं तो समूचे भारतीय उपमहाद्वीप की सर्जनात्मकता पर हमारी नज़र रहती है और रहनी भी चाहिए। इसलिए मुनव्वर राना ने फ़ैज़, अहमद नदीम क़ासमी, इफ़्तिखार आरिफ़, क़तील शिफ़ाई, परवीन शाकिर, वज़ीर आग़ा, हबीब जालिब, नासिर काज़मी, मुनीर नियाज़ी और अहमद मुश्ताक़ के शे'रों को भी इस चयन में उचित जगह दी है।
मुनव्वर राना ने अपनी पसन्द में उर्दू व हिन्दी की साझी रचनात्मकता को भी ध्यान में रखा है। अपने एक शे’र में कहा भी है कि उर्दू व हिन्दी में जो रिश्ता है, वह ‘‘कहीं दुनिया की दो ज़िन्दा ज़बानों में नहीं मिलता।’’ दोनों भाषाओं में काव्य रूपों के परस्पर लेन-देन का एक लम्बा इतिहास रहा है। हिन्दी में ग़ज़ल अब कोई नयी चीज़ नहीं रह गयी है। इसलिए इन मोतियों में नीरज, दुष्यन्त कुमार, रवीन्द्र जैन, बालस्वरूप राही व कुछ अन्य कवियों के मोती भी अपनी आभा बिखेर रहे हैं। पर बात कही जानी चाहिए कि उनकी प्राथमिकता पर उर्दू ग़ज़ल रही है। दरअसल यह उर्दू शाइरी के रंग-रंग के फूलों का गुलदस्ता है।
—जानकीप्रसाद शर्मा
Munawwar Rana
कई दशकों से अपने मुल्क और मुल्क की सरहदों को पार कर ग़ज़ल को हिंदुस्तानी तहज़ीब में ढालकर लोकप्रियता के शिखर पर पहुँचाने वाले शायर का नाम है सैयद मुनव्वर अली राना. अदब की अंजुमन में इस शायर को सिर्फ़ मुनव्वर राना के नाम से जाना और पहचाना जाता है. इनकी शायरी की भाषा न हिंदी है न उर्दू, बल्कि हिंदूस्तानी है. मुनव्वर आधुनिक दौर के प्रगतिशील शायर हैं. वे जिस संजीदगी से कागज़ पर अपनी संवेदनाओं को उकेरते हैं उतनी ही संजीदगी और ज़िम्मेदारी से मंच पर अपने कलाम पेश करते हैं.
हिंदी उर्दू के काव्य मंच हों या पत्र-पत्रिकाओं का संसार, उनकी मौजूदगी अभिभूत कर देती है !
Mohammad Naushad
Munawwar Rana
,Mohammad Naushad
VANI PRAKSHAN