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Wife Swapping

Author :

Vineeta Yadav

Publisher:

VANI PRAKSHAN

Rs316 Rs395 20% OFF

Availability: Available

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Publisher

VANI PRAKSHAN

Publication Year 2026
ISBN-13

9789373484563

ISBN-10 9373484567
Binding

Hardcover

Number of Pages 125 Pages
Language (Hindi)
Weight (grms) 250
Subject

True Accounts

वाइफ़ स्वॉपिंग वरिष्ठ खोजी पत्रकार विनीता यादव की एक साहसिक, झकझोर देने वाली और आँखें खोल देने वाली रिपोर्ताज पुस्तक है। यह किताब उस समाज की परतें उघाड़ती है, जिसे हम सभ्य, संस्कारी और सुरक्षित मानकर चलते हैं, लेकिन जिसके भीतर स्त्री देह के बाज़ारीकरण और विवाह संस्था के भीतर छिपी क्रूर सच्चाइयाँ साँस ले रही हैं। यह कोई काल्पनिक उपन्यास नहीं, बल्कि ज़मीनी हक़ीक़तों पर आधारित दस्तावेज़ है—उन महिलाओं की कहानियाँ, जो पति के कहने पर, समाज के डर से और परिवार की ‘इज़्ज़त’ के नाम पर अपने अस्तित्व का सौदा करने को मजबूर हैं। विनीता यादव अपने 23 वर्षों के खोजी पत्रकारिता अनुभव के साथ उन गलियों, घरों और कमरों तक पहुँचती हैं, जहाँ यह सब ‘नॉर्मल’ बना दिया गया है। किताब न सिर्फ़ ‘वाइफ़ स्वॉपिंग’ की प्रक्रिया और मानसिकता को सामने लाती है, बल्कि इसके सामाजिक, भावनात्मक और मनोवैज्ञानिक प्रभावों का गहन विश्लेषण भी करती है। यह पुस्तक पाठक को असहज करती है, सवाल पूछने पर मजबूर करती है और स्त्री, विवाह और नैतिकता को नये सिरे से समझने की चुनौती देती है। ‘वाइफ़ स्वॉपिंग’—एक ऐसा सच, जिसे देखना मुश्किल है, लेकिन नज़रअन्दाज़ करना अपराध।

Vineeta Yadav

मैं विनीता यादव हूँ। पत्रकारिता मेरे लिए कभी पेशा नहीं रहा—यह मेरा स्वभाव है, मेरी जिज्ञासा है और कभी-कभी तो मेरा संघर्ष भी। स्टूडियो से सड़क तक, कैमरे की रोशनी से लेकर अँधेरी गलियों तक—मैंने सच की तलाश में जितने क़दम बढ़ाये, उतने ही सवाल भी मेरे भीतर जगे। पिछले 23 वर्षों में 66 से भी ज़्यादा स्टिंग ऑपरेशन किये हैं, और हर स्टिंग के बाद मुझे यह एहसास और पुख़्ता हुआ कि समाज दिखाई देने जितना साफ़ नहीं होता, और शब्द सिर्फ़ लिखे नहीं जाते—लड़ते भी हैं। मैं कहानियाँ लिखती नहीं, मैं उन्हें जीती हूँ—उनसे मिलती हूँ, उनकी आँखें पढ़ती हूँ, उनके सच को अपने भीतर उतारती हूँ और फिर वही सच काग़ज़ पर बहता चला जाता है। कई बार मेरी क़लम दर्द में डूबी हुई होती है, कई बार ग़ुस्से में, और कई बार ऐसे सवाल लेकर जिनका जवाब आज भी समाज के पास नहीं है। मेरी नज़र हर उस जगह जाती है जिसे लोग छिपा देना चाहते हैं। मैं उन आवाज़ों को सुनती हूँ जिन्हें कोई सुनना नहीं चाहता, उन कहानियों को उठाती हूँ जो असहज हैं, कड़वी हैं, लेकिन सच हैं। शायद यही वजह है कि मेरे लिखे पन्ने सिर्फ़ पढ़े नहीं जाते—वो कचोटते हैं, बेचैन करते हैं, सोचने पर मजबूर करते हैं। मैं चाहती हूँ कि मेरा लेखन दस्तावेज़ बनकर न रहे—वह एक सवाल बने। एक शक बने। एक झटका बने। ताकि अगर कोई पाठक मेरी किताब बन्द भी करे, तो उसकी सोच बन्द न हो। मैं विनीता यादव। सिर्फ़ लिखती नहीं—सच को दर्ज करती हूँ। जिसे दुनिया छिपाती है, मैं वही उजागर करती हूँ। ट्विटर : @vineetanews
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