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Astitva

Author :

Astha Naval

Publisher:

VANI PRAKSHAN

Rs556 Rs695 20% OFF

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Publisher

VANI PRAKSHAN

Publication Year 2026
ISBN-13

9789373486628

ISBN-10 9373486624
Binding

Hardcover

Number of Pages 224 Pages
Language (Hindi)
Weight (grms) 400
Subject

Comics, Mangas & Graphic Novels

आस्था नवल का उपन्यास अस्तित्व स्त्री-जीवन के गहरे दुख, उसकी चुप्पियों और संघर्षों से जन्मा है। आस्था सन् 2007 में शादी के बाद से अमेरिका जाकर बस गयीं लेकिन यहाँ रहते हुए उन्होंने घर-परिवार, रिश्तों और समाज में लगातार नेपथ्य में खड़ी जिस स्त्री को देखा, वह छवि उनके साथ रही। यह आज़ादी के बाद के उस भारतीय समाज की कथा है जो परम्परा और आधुनिकता की उलझनों में फँसा है। अत्यन्त संवेदनशीलता और धैर्य के साथ आस्था ने औसत मध्यवर्गीय परिवार और समाज की वे परतें खोली हैं जिन्हें अक्सर सामान्य मान लिया गया है-बेटे-बेटी के बीच भेद, स्त्री पर घर और नौकरी की दोहरी जिम्मेदारियाँ, और उसका हर बार अपनी इच्छाओं को पीछे रखना। स्त्रियाँ-चाहे वे किसी भी पीढ़ी, जाति या वर्ग से हों-इन उलझनों के बीच जीती हैं, संघर्ष करती हैं और हर बार अपने जीवन को नये सिरे से परिभाषित करती हैं। अपने अस्तित्व की यह खोज स्त्री की उस चुप्पी को मुखर कर देती है जो अपने बलबूते पर खड़े होने के लिए अपने पैरों तले की जमीन तलाश रही है और अपने सपनों का मुट्ठी भर आसमान। अस्तित्व पढ़ते हुए यह अहसास गहराता है कि स्त्री का जीवन का संघर्ष केवल निजी नहीं, सामूहिक भी है। हर घर, परम्परा और अनुभव में उसकी कहानी कहीं न कहीं दुहराई जाती है। आस्था नवल ने सरल और प्रवाहमयी भाषा में इस आत्मीय कथानक को सहेजा और सँवारा है। पढ़ने के बाद भी उपन्यास की कुछ पंक्तियाँ देर तक कानों में गूँजती रहती हैं-"क्या लड़की होना इतनी बुरी बात है?", "जीवन सिर्फ अपना नहीं होता", "हर ओर दुख ही दुख है।" ये वाक्य केवल पात्रों की पीड़ा नहीं, बल्कि उस पूरे समाज की त्रासदी का दस्तावेज हैं जिसे हम जीते आये हैं। इस परिचित कथा सृष्टि में उपन्यास का अन्त सबसे अधिक प्रभावित करता है। स्वचेतना का बोध एक नये प्रारम्भ का संकेत देता है, उपन्यास के आरम्भ में जो असम्भाव्य-सा दिखता था वही उपन्यास के अन्त में रिश्तों की कैद से मुक्त स्त्री के होने से, उसके अस्तित्व से जगमगा उठा है, बन्द मुट्ठी में खिल आये जुगनू की तरह... - रेखा सेठी

Astha Naval

आस्था नवल आस्था नवल का जन्म दिल्ली के साहित्यिक परिवार में हुआ। पिताः डॉ॰ हरीश नवल और माता डॉ॰ स्नेह सुधा से बचपन से ही लेखन कला को विरासत में पाया। ननिहाल और पिता के घर में सात वर्ष की आयु में कविता लेखन का प्रोत्साहन मिला और तबसे ही कविता और लेख लिख रही हैं। आस्था नवल ने दिल्ली विश्वविद्यालय के हिन्दू कॉलेज से प्रथम श्रेणी में हिन्दी में स्नातक और स्नातकोत्तर की उपाधि ग्रहण की। यूजीसी से सीनियर छात्रवृत्ति प्राप्त की और साथ साथ जामिया मिलिया विश्विविद्यालय से हिन्दी नाटक में प्रो॰ अशोक चक्रधर के नेतृत्व में पीएचडी की। पीएचडी करते हुए उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय के इंद्रप्रस्थ और मिरांडा हाऊस कॉलेज में अध्यापन कार्य भी किया। 2001 में उनकी प्रथम पुस्तक ‘आस्था की डायरी’ का लोकार्पण बलगेरिया के सोफिया विश्वविद्यालय में हुआ। उनकी दूसरी पुस्तक ‘लड़की आज भी’ (प्रथम काव्य संकलन) का लोकार्पण सम्माननीय कमलेश्वर जी के करकमलों द्वारा 2006 में दिल्ली में हुआ। 2016 में इनके दूसरे काव्य संग्रह ‘विस्थापित मन’ का प्रकशन भारत के हिन्दी साहित्य निकेतन द्वारा किया गया जिसका विमोचन वर्जीनिया में किया गया। साहित्य अमृत, विश्वा, गर्भनाल, हिन्दी जगत, गगनाँचल जैसी प्रख्यात पत्र पत्रिकाओं में कविता और लेख द्वारा उनका निरंतर योगदान रहता है। आस्था नवल अमेरिका के साहित्य जगत में जाना पहचाना नाम हैं। आस्था नवल कवि गोष्ठियों में, देश विदेश के लघु कथा, कहानी, बाल हिन्दी सम्मेलनों, आदि में भाग लेने के साथ साथ कई कार्यक्रमों का संचालन करने के लिए भी जानी जाती हैं। प्रति माह चार कवि गोष्ठी का आयोजन कर अमेरिका और कनाडा के कवियों का सम्मेलन आयोजित करती हैं जो यू ट्यूब पर देखा जा सकता है। आस्था नवल प्रकृति प्रेमी हैं, सौहार्द की प्रचारक हैं। इनका यू ट्यूब चैनल ‘आस्था की डायरी” के नाम से है जिसमें आप इनकी कविताओं के साथ साथ किस्से व समाज से जुड़ी चर्चायें भी सुन सकते हैं। सम्प्रति पति ललित ग्रोवर और बच्चों आयूष और अर्जुन के साथ वर्जीनिया, अमेरिका में रहती हैं।
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