| Publisher |
Rajkamal Prakashan |
| Publication Year |
2012 |
| ISBN-13 |
9788126723423 |
| ISBN-10 |
9788126723423 |
| Binding |
Paperback |
| Number of Pages |
284 Pages |
| Language |
(Hindi) |
| Dimensions (Cms) |
21.5 X 14 X 1.5 |
| Subject |
Comics, Mangas & Graphic Novels |
मैं बुरी तरह सपने देखता रहा हूँ। चूँकि सपने देखना-न-देखना अपने बस में नहीं होता, मैंने भी इन्हें देखा। आप सबकी तरह मैंने भी कभी नहीं चाहा कि स्वप्न फ़्रायड या युंग जैसों की सैद्धान्तिकता से आक्रान्त होकर आएँ या प्रसव पीड़ा की नीम बेहोशी में अखिल विश्व के पापनिवारक-ईश्वर के नए अवतार की सुखद आकाशवाणी के प्ले-बैक के साथ। मीडिया के ईथर में तैरते हुए 1992 की नीम बेहोशी में ‘चिन्ताघर’ नामक लम्बा स्वप्न देखा गया था और चौदह बरस बाद अपने सिरहाने रखी 2006 की डायरी में जो सफे मिले, उनका नाम था—‘कॉमरेड गोडसे’। ऐसे जैसे एक बनवास से दूसरे बनवास में जाते हुए ख़्वाब के दो दिन। कुछ लोग कहते हैं, तब अख़बारों के एडीटर की जगह मालिक के नाम ही छपते थे, चौदह साल बाद कहने लगे इश्तहारों और सूचनाओं के बंडलों पर जो एडीटर का नाम छपता है, वह मालिक के हुक्म बिना इंच भर न इधर हो, न उधर। कुछ लोग कहते हैं, बड़ा ईमान था जो हाथ से लिखते थे, चौदह साल बाद कहने लगे छोटा कम्प्यूटर है लाखों-लाख पढ़ते हैं। तब एक लड़का था जो ‘चिन्ताघर’ में घूमता, मुट्ठियों में पसीने को तेजाब बनाता, दियासलाई उछालना चाहता था। चौदह साल बाद दो हो गए, जो ज़ोरदार मालिक और चमकदार एडीटर के चपरासी और साथी की शक्ल में आत्माओं के छुरे उठाए फिरते हैं। पहले दिन से चौदह बरस बाद के बनवासी दिन टकरा-टकरा कर चिंगारियाँ फेंकते हैं। इन चिंगारियों में हुई सुबह ख़्वाबों को खोल-खोल दे रही है। आज इस सुबह सपनों की प्रकृति के अनुरूप भयंकर रूप से एक-दूसरे में गुम काल, स्थान और पात्रों के साथ मैं अपने सपनों की यथासम्भव जमावट का एक चालू चिट्ठा आपको पेश करता हूँ।
Yashwant Vyas
"यशवंत व्यास
जन्म : 6 मार्च, 1964
नए प्रयोगों के लिए चर्चित व्यंग्यकार-पत्रकार।
जो सहमत हैं सुनें, चिंताघर, अपने गिरेबान में, अमिताभ का अ, कामरेड गोडसे, इन दिनों प्रेम उर्फ़ लौट आओ नीलकमल, यारी-दुश्मनी, ख़्वाब के दो दिन, अब तक छप्पन, कल की ताज़ा ख़बर, हिट उपदेश : द बुक ऑफ़ रेजर मैनेजमेंट आदि किताबें।
हाल में शायर-फ़िल्मकार गुलज़ार के साथ चर्चित किताब बोसकीयाना; यारी-दुश्मनी, तथास्तु, रसभंग और नमस्कार जैसे लोकप्रिय कॉलम। किताबों में दो उपन्यास शामिल, दोनों पुरस्कृत। विभिन्न मीडिया उपक्रमों में सम्पादक, सलाहकार और संस्थापक की भूमिकाएँ।
लेखन के लिए शरद जोशी राष्ट्रीय सम्मान। एक दशक से प्रतिष्ठित अख़बार अमर उजाला के समूह सलाहकार और नए माध्यमों पर कुछ अनूठे प्रयोगों में व्यस्त जिनमें से एक है—खटाक फ़िक्शन सीरीज़, जो डिजिटल और प्रिंट के साझे की दोस्ताना कारीगरी है।"
Yashwant Vyas
Rajkamal Prakashan