| Publisher |
HIND YUGM |
| Publication Year |
2013 |
| ISBN-13 |
9789381394359 |
| ISBN-10 |
9381394350 |
| Binding |
Paperback |
| Edition |
2nd |
| Number of Pages |
256 Pages |
| Language |
(Hindi) |
| Subject |
Indian Writing |
तिरहुत के एक गाँव की यह देखी, सुनी, भोगी कहानी हाल के अतीत और आज के बदलाव का विलक्षण चित्रण है। यह एक बहुयामी कथा है जहाँ भाँति-भाँति के प्रसंग गाँव के ठकुराने से ही नहीं, दलित टोलों के कोने-अंतरों से भी झाँकते हुए पाठक को अपनी ओर खींचते हैं। विषमताओं से लदी इस दुनिया में राजपूती दबदबा और भूमिहीनों का यथार्थ तो है ही, पनभरनी औरतों की मशक़्क़त, नाउ, मुसलमान दर्ज़ियों और ‘डाकपिन साहेब' की दिनचर्या, मछली मारने की आध-दर्जन विधाएँ, बिजली की ग़ैर-मौज़ूदगी में मोबाइल चार्ज करने के अद्भुत जुगाड़; इन सबके माध्यम से ग्रामीण पात्र मानो हमसे बातचीत करते प्रतीत होते हैं। नृविज्ञान शास्त्री एम. एन. श्रीनिवास का 'यादों से रचा गाँव’ और विश्वनाथ त्रिपाठी का 'नंगातलाई का गाँव', इन दो उत्कृष्ट रचनाओं की याद ताज़ा करती है राकेश कुमार सिंह के तरियानी छपरा की यह अजीबो-ग़रीब दास्तान। -शाहिद अमीन
Rakesh Kumar Singh
काम और जज़्बात के बीच हिलकोरे मारता एक लापरवाह, अल्हड़ और अराजक टहलबाज़। सराय-सीएसडीएस के साथ मीडिया, शहर, बाज़ार और श्रम पर की गई माथापच्ची और ‘मीडियानगर’ शृंखला के संपादन में इसने आठ-दस बरस खपाए। कुछ समय वनाधिकारों के मसले पर ‘फेयाड़ा’ और शहरी बेघरी पर ‘हमशहरी’ की एडिटरी में भी। धंधेबाज़ी के अंतिम 17 महीने कॉर्पोरेट कम्युनिकेशन्स, मीडिया मैनेजमेंट और पीआरगीरी में। लिखने-उखने का फितूर। 'बम संकर टन गनेस’ उसी का बाईप्रोडक्ट। जेंडर बायस्ड भ्रूण हत्याओं, रेप्स और तेज़ाब हमलों वाले भारतवर्ष का जेंडर-चिंतन और इसकी निर्मिति से जुड़ा जोड़ा भर सवाल लादे उन्नीस-बीस महीनों से Ride for gender freedom पर।
Rakesh Kumar Singh
HIND YUGM