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Stri

Author :

Gudipati Venkatchalam

Publisher:

VANI PRAKSHAN

Rs540 Rs675 20% OFF

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Publisher

VANI PRAKSHAN

Publication Year 2026
ISBN-13

9789373488745

ISBN-10 9373488740
Binding

Hardcover

Number of Pages 228 Pages
Language (Hindi)
Weight (grms) 400
Subject

Indian Writing

तेलुगु साहित्य में चलम् (1894-1979) को प्राप्त विशिष्टता अतुलनीय है। कहा जा सकता है कि कोई व्यक्ति अपनी खोज करता हुआ जितनी दूर जा सकता है, उतनी दूर तक की इन्होंने यात्रा की है और बिना झिझक या डर के अपनी इस सारी यात्रा को अपनी रचनाओं में प्रतिफलित किया है। चलम् ने कहानी, उपन्यास, कविता, रूपक, एकांकी, निबन्ध, पत्र लेखन, अनुवाद आदि कई विधाओं में अनेक रचनाएँ की हैं। इनके जीवन और साहित्य को लेकर अनेक निबन्ध और पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं। 100 वर्ष पहले 1925 में रचित और भारत का पहला स्त्रीवादी सिद्धान्त-ग्रन्थ या मेनिफेस्टो कहलाने योग्य यह पुस्तक चलम् की रचनाओं में सर्वाधिक प्रशंसित और अभिशंसित हुई है। स्त्री-पुरुष सम्बन्धों की समस्या के विषय में चलम् के विचार स्पष्ट रूप से जानने हों, तो सिद्धान्तपरक यह रचना पढ़नी ही पड़ेगी। इस रचना के कई संस्करणों के लिए कई बार लिखी इनकी भूमिकाओं को पढ़ना भी आवश्यक है। स्त्री की स्वतन्त्रता को लेकर वे क्या चाहते थे, यह उन्होंने यहाँ स्पष्ट कर दिया है। जिन विचारों से सहमति जताने में आज भी हमारे समाज को झिझक होगी, ऐसे उग्र स्त्रीवादी विचारों और आन्दोलन के पुरोधा के रूप में चलम् यहाँ प्रस्तुत हुए हैं। इसीलिए चलम् आने वाली पीढ़ियों के लेखक हैं। चलम् की रचनाओं में सर्वाधिक संस्करण भी इसी पुस्तक के प्रकाशित हुए हैं।

Gudipati Venkatchalam

गुड़िपाटि वेंकटचलम् (1894-1979) स्त्री मुक्ति के लिए ही क़लम हाथ में लेनेवाले क्रान्तिकारी रचनाकार के रूप में प्रसिद्ध हैं। जहाँ स्त्री का जन्म लेना एक समस्या हो, उसका बड़ा होना एक समस्या हो और उसका जीना एक समस्या हो, ऐसे समाज में स्त्री कितने प्रकार से शोषण और हिंसा का शिकार हो रही है, इसका गहरा चित्रण चलम् ने अपने विपुल साहित्य में किया है। कहानी, उपन्यास, निबन्ध, कविता... ऐसी कोई विधा नहीं है, जिसमें इन्होंने इस विषय को लेकर न लिखा हो। एक अभियानी के रूप में इन्होंने अपने विचारों को बार-बार पाठकों के सामने रखा है। इतना ही नहीं, "झिझको मत, मैं भी तुम लोगों के साथ हूँ, चलो !" कहकर स्त्रियों को मुक्ति के पथ पर आगे बढ़ाया है। तेलुगु साहित्य में स्त्रीवाद के जनक माने जानेवाले चलम् सौ वर्ष बाद भी अत्यन्त प्रभावशाली लेखक, दार्शनिक, समाज सुधारक और अभ्युदयवादी के रूप में अपना स्थान बनाये हुए हैं।
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