| Publisher |
VANI PRAKSHAN |
| Publication Year |
2026 |
| ISBN-13 |
9789373488516 |
| ISBN-10 |
9373488511 |
| Binding |
Hardcover |
| Number of Pages |
305 Pages |
| Language |
(Hindi) |
| Weight (grms) |
450 |
| Subject |
Indian Writing |
ज्ञान-शिशिर उर्फ़ ज्ञानरंजन और कर्मेन्दु शिशिर के ख़तो- किताबत की यह महत्त्वपूर्ण किताब ‘पत्र संवाद’ और ‘पत्र संवाद कला’ का पारदर्शी आईना है। हिन्दी साहित्य में यह सुदीर्घ परम्परा है। यह कृति उसकी एक उज्ज्वल कड़ी है। किताब में इतिहास और संस्कृति के अक़्स हैं। साथ ही दो लेखकों के स्वभाव, सरोकार, राग, खुली मनःस्थिति, समय के चिन्ता-चित्र और विवादों पर उन्मुक्त रायशुमारी दृष्टव्य है।
दो अदीब जब संवाद में होते हैं तो यह जुगलबन्दी वाचिक के अलावा लिखित होती है। लिखा गया शब्द इतिहास में दर्ज होता है। वाचिक का संवाद विलुप्त हो जाता है। आत्मीय और मुक्त संवाद का माध्यम है पत्र-साहित्य। इसमें बिना लाग-लपेट के प्रकृत शिल्प में सत्य अभिव्यक्त होता है। नाटकीयता और पूर्वग्रह से मुक्त ऐसा लेखन अधिक विश्वसनीय होता है, जो यहाँ है। अपवादों को छोड़कर यह साहित्य, कालजयी होने के सफ़र पर भासमान दिखाई देता है। उदाहरण के लिए पत्र साहित्य के इतिहास में जगह बना चुके जो नाम स्मरण आते हैं उनमें भारतेन्दु, दयानन्द सरस्वती, गांधी, टैगोर, नेहरू, प्रेमचन्द, आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी, प्रताप नारायण मिश्र, प्रेमघन, ठाकुर जगमोहन सिंह, महादेवी वर्मा, डॉ. वासुदेव शरण अग्रवाल, निराला, रामविलास शर्मा, केदारनाथ अग्रवाल, यशपाल, बच्चन, अज्ञेय, शमशेर, मुक्तिबोध, नामवर सिंह, अश्क़, मलयज, धर्मवीर भारती, कमलेश्वर आदि हैं। ग़ालिब और फ़िराक़ गोरखपुरी की परम्परा में उर्दू के लेखकों का पत्र-साहित्य भी आला दर्ज़े में शुमार है।
कह सकते हैं ‘ज्ञान-शिशिर’ का यह संवाद इस परम्परा का एक मानीख़ेज़ अध्याय है जिसमें बीते तीन दशकों का साहित्य समाज केन्द्र में है। वक़्त की तस्वीरें इनमें बरामद होती हैं। जबकि सोशल मीडिया ने पत्र-साहित्य को हाशिये पर डाल दिया है, तब यह किताब तत्कालीन समय के समय, समाज और इतिहास को अपनी तरह से रोशनी में लाती है।
–लीलाधर मंडलोई
Manohar Billaure
मनोहर बिल्लौरे
शिक्षा : स्नातक तक बरमान-घाट, नरसिंहपुर, म.प्र. में। सागर विश्वविद्यालय, सागर से वनस्पति विज्ञान में स्नातकोत्तर तथा शिक्षा-स्नातक।
जीविका : एक अनुदान प्राप्त विद्यालय में 1975 से 2015 तक जबलपुर (म.प्र.) में अध्यापन।
कार्यक्षेत्र : 30-35 सालों से ‘पहल’ से सघन जुड़ाव, प्रगतिशील साहित्यिक, सांस्कृतिक संस्थाओं से निरन्तर सम्बद्धता और सहयोग। ‘पहल’ के बन्द होने के बाद अब ‘अन्विति’ के सम्पादक मण्डल में।
प्रकाशन : ‘पहल’ सहित देश के प्रमुख साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं में समय-समय पर कविताओं और आलेखों का प्रकाशन। कविता-संग्रह : गुरुत्वाकर्षण के विरुद्ध, पार होना चाहता हूँ। ज्ञानरंजन पर दो किताबों : अमरूद की ख़ुशबू तथा कुछ हमारी तुम्हारी का संकलन- संयोजन।
******
कर्मेन्दु शिशिर
जन्म : 26 अगस्त 1953, वाराणसी, मूल निवास : उनवाँस, बक्सर (बिहार)
शिक्षा : एम.ए. (हिन्दी), पटना विश्वविद्यालय, पटना।
प्रकाशित कृतियाँ : बहुत लम्बी राह (उपन्यास), कितने दिन अपने, बची रहेगी ज़िन्दगी, लौटेगा नहीं जीवन (सम्पूर्ण कहानियाँ) (कहानी-संग्रह); नवजागरण और संस्कृति (वैचारिक लेख-संग्रह), राधामोहन गोकुल और हिन्दी नवजागरण (शोध-समीक्षा), नवजागरण के शिल्पी (आलोचनात्मक लेख), पत्रकारिता के युग निर्माता शिवपूजन सहाय, समकालीन गद्य के आसपास, डॉ. रामविलास शर्मा : नवजागरण और इतिहास लेखन, (आलोचनात्मक), भारतीय नवजागरण और समकालीन सन्दर्भ, नवजागरण की निर्मिति (आलोचनात्मक वैचारिकी), कहानी के आसपास (कहानी-समीक्षा), भारतीय मुसलमान (दो खंड)(शोध इतिहास विवेचन), बात बोलेगी (साक्षात्कार), 1857 की राजक्रान्ति विचार और विश्लेषण, निराला और राम की शक्तिपूजा (आलोचना)। सम्पादन : भोजपुरी होरी गीत (दो भाग), बसन्त गीत, सोमदत्त की गद्य रचनाएँ, हिन्दी नवजागरण : राधाचरण गोस्वामी, राधामोहन गोकुल की प्रतिनिधि रचनाएँ, राधामोहन गोकुल समग्र (दो खंड) और सत्यभक्त और साम्यवादी पार्टी। विशेष : नवजागरणकालीन पत्रकारिता ‘सारसुधा-निधि’ (दो खंड), नवजागरणकालीन पत्रकारिता : मर्यादा, मतवाला (तीन खंड), पहल (तीन खंड) का सम्पादन, पहल और ज्ञानरंजन ।
Manohar Billaure
VANI PRAKSHAN