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Nadiyan Hi Raah Batayengi

Author :

Rakesh Kabir

Publisher:

Rajkamal Prakashan

Rs297 Rs350 15% OFF

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Publisher

Rajkamal Prakashan

Publication Year 2026
ISBN-13

9789377473136

ISBN-10 9377473136
Binding

Paperback

Number of Pages 192 Pages
Language (Hindi)
Weight (grms) 200
Subject

Indian Writing

नुष्य का और धड़ विशालकाय पशु का था। जो बहुत तेजी से पहाड़ों को खा रहा था और समुन्दरों को पी रहा था। मैंने पूछा कि आप इतनी जल्दी-जल्दी यह सब क्यों खा रहे हैं तो उसने जवाब दिया कि कहीं ऐसा न हो कि कल यह सब न रहे इसलिए तेजी से खा रहा हूँ।

गौर करने की बात है कि खलील जिब्रान ने पूँजीवाद का यह जो रूपक गढ़ा है उसमें सिर मनुष्य का और धड़ विशालकाय पशु का क्यों रखा? शायद इसलिए कि जो इतनी निर्ममता से प्रकृति का विनाश कर रहा है दरअसल उसके पास एक दिमाग है जो सोच सकता है लेकिन उसका पेट भर ही नहीं रहा है। इसलिए उसका दिमाग काम नहीं कर रहा है कि यह सब खत्म हो जाएगा तो क्या परिणाम होगा? उसके दिमाग की नसें पेट की भाषा से अधिक कुछ पढ़ नहीं पा रही हैं कि कल यह नहीं होगा तो क्या होगा! सारी दुनिया में यही चक्र चल रहा है। मारियो वार्गास ल्योसा के उपन्यास ‘क़िस्सागो’ की माचिग्वेंगा जनजाति हो, चाहे बक्सवाहा के जंगलों के आदिवासी या कि नियमगिरि पहाड़ों में बसे डोंगरिया कोंध। सबके पर्यावरण को ऐसे ही प्राणी लगातार बेरहमी से निगल रहे हैं।

राकेश की कविताओं में ऐसे ही भयावह प्राणियों के हजारों छोटे-छोटे संस्करण दिख रहे हैं जो अपने स्तर पर समस्त प्रकृति को चर रहे हैं। लेकिन कवि भी अपने भरोसे पर कायम है कि नदियाँ भले आज विलोपित हैं, लेकिन कल वे अपनी राह खोजेंगी। यही नहीं, वे मनुष्य को जीने का शऊर भी सिखाएँगी।

—रामजी यादव

Rakesh Kabir

राकेश कबीर का जन्म 20 अप्रैल, 1984 को महाराजगंज जिले के लक्ष्मीपुर एकडंगा गाँव में हुआ। गोरखपुर विश्वविद्यालय से समाजशास्त्र में स्नातकोत्तर करने के बाद उन्होंने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से 'भारतीय सिनेमा में प्रवासी भारतीयों का चित्रण' विषय पर एम.फिल. और 'ग्रामीण सामाजिक संरचना में निरन्तरता एवं परिवर्तन' विषय पर पी-एच.डी. की उपाधि प्राप्त की। उनकी कविताएँ, लेख और कहानियाँ हिन्दी और अंग्रेज़ी की अनेक पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हैं। सिनेमा, इतिहास, समाज और संस्कृति के विभिन्न आयामों में गहरी दिलचस्पी रखनेवाले राकेश कबीर की प्रकाशित कृतियों में पाँच कविता-संग्रह 'नदियाँ बहती रहेंगी', 'कुँवरवर्ती कैसे बहे?', 'नदियाँ ही राह बताएँगी', 'तुम तब आना...', 'चिड़ियों का लोकतंत्र' प्रकाशित हैं। सम्प्रति भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी हैं। ई-मेल : patelrk2007@gmail.com
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