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Ghumakkad Shastra

Author :

Rahul Sankrityayan

Publisher:

Yuvaan Books

Rs169 Rs199 15% OFF

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Publisher

Yuvaan Books

ISBN-13

9788169235433

ISBN-10 816923543X
Binding

Paperback

Edition 2026
Number of Pages 146 Pages
Language (Hindi)
Subject

World History

सभ्यताओं का विकास बगैर घुमक्कड़ों के इस तरह नहीं हुआ होता। समुद्रों, पर्वतों और विशाल मरुस्थलों से घिरे हुए भू-भाग के लोग अपने आसपास को ही पूरा संसार समझते हुए अपनी ही जगह पर एकरस जीवन जीते हुए ख़त्म हो जाते। ना दक्षिणी ध्रुव के बर्फीले क्षेत्र में रहने वाले अफ्रीका के गर्म क्षेत्रों को जान पाते, न भारत के बारे में अमेरिका और यूरोप के लोगों को पता चलता। ये उन जुनूनी घुमक्कड़ों की वजह से हुआ कि संस्कृतियों, वस्तुओं और सामाजिक विविधताओं का सारी दुनिया में एक दूसरे से परिचय, आदान-प्रदान हुआ। महाघुमक्कड़ राहुल सांकृत्यायन ने सरस और मनोरंजक शैली में लिखे इस शास्त्र में घुमक्कड़ी के सभी हिस्सों की अपने अनुभव के आधार पर विशद और तार्किक व्याख्या की है। घुमक्कड़ी के लिए घर छोड़ने की सही उम्र क्या हो, किन चीजों का ज्ञान हो, घुमक्कड़ को अपनी यात्रा में क्या करना चाहिए क्या नहीं करना चाहिए जैसे सवालों के ठोस जवाब इस शाख में मिलते हैं। इसके साथ-साथ धर्म, दर्शन, कला, घुमक्कड़ जातियों और विशेषकर स्त्री घुमक्कड़ों के लिए दिशानिर्देश इसे एक मूल्यवान ग्रन्थ बनाते हैं। यह शास्त्र हर नयी पीढ़ी को मनुष्य की शाश्वत यायावरी की याद दिलाता है और घुमक्कड़ी के लिए उकसाता है।

Rahul Sankrityayan

राहुल सांकृत्यायन,जन्म : 9 अप्रैल, 1893,मूर्धन्य और अन्तरराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त विद्वान राहुल सांकृत्यायन साधु थे, बौद्ध भिक्षु थे, यायावर थे, इतिहासकार और पुरातत्त्ववेत्ता थे, नाटककार और कथाकार थे और थे जुझारू स्वतंत्रता-सेनानी, किसान-नेता, जन-जन के प्रिय नेता। उनके अनन्य मित्र भदंत आनन्द कौसल्यायन के शब्दों में, ''उन्होंने जब जो कुछ सोचा, जब जो कुछ माना, वही लिखा, निर्भय होकर लिखा। चिन्तन के स्तर पर राहुल जी कभी भी न किसी साम्प्रदायिक विचार-सरणी से बँधे रहे और न संगठित-सरणी से। वह 'साधु न चले जमात' जाति के साधु पुरुष थे।राहुल जी ने धर्म, संस्कृति, दर्शन, विज्ञान, समाज, राजनीति, इतिहास, पुरातत्त्व, भाषा-शास्त्र, संस्कृत ग्रन्थों की टीकाएँ, अनुवाद और इसके साथ-साथ रचनात्मक लेखन करके हिन्दी को इतना कुछ दिया कि हम सदियों तक उस पर गर्व कर सकते हैं। उन्होंने जीवनियाँ और संस्मरण भी लिखे और अपनी आत्मकथा भी। अनेक दुर्लभ पांडुलिपियों की खोज और संग्रहण के लिए व्यापक भ्रमण भी किया।निधन : अप्रैल, 1963
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