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| Publisher | HIND YUGM |
| Publication Year | 2026 |
| ISBN-13 | 9788169516129 |
| ISBN-10 | 8169516129 |
| Binding | Paperback |
| Number of Pages | 280 Pages |
| Language | (Hindi) |
| Weight (grms) | 230 |
| Subject | Indian Writing |
भारत एक ऐसे दौर से गुज़र रहा है जहाँ राज्य (स्टेट) अपनी कल्याणकारी भूमिका से पल्ला छुड़ाता जा रहा है, उसकी भाषा और नज़रिया किसी सेवा प्रदाता एजेंसी जैसा ही हो चला है। इसके कई उदाहरण हैं। सरकारी योजनाओं का इस्तेमाल करने वालों को ‘लाभार्थी’ कहना और सब्सिडी को ‘रेवड़ी’ कहना तो अब बहुत आम और स्वीकार्य हो चला है, जो दिखाता है कि स्टेट अब नागरिकों के साथ किसी संवैधानिक अनुबंध से जुड़ी इकाई की तरह नहीं, बल्कि रहनुमा या राजा की तरह पेश आ रहा है। ठीक इसी तर्ज़ पर, ज़्यादातर सवर्ण मध्यवर्ग से आने वाले तकनीकी पेशेवरों के साथ भी कॉर्पोरेट कंपनियाँ बरताव कर रही हैं। बस वे तभी बोल पाते हैं जब संकट सामने होता है या फिर दबाव में टूट जाते हैं।
Rohin Kumar
HIND YUGM