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Geet-Farosh | गीत-फ़रोश

Author :

Bhawaniprasad Mishra

Publisher:

Rajkamal Prakashan

Rs254 Rs299 15% OFF

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Publisher

Rajkamal Prakashan

Publication Year 2026
ISBN-13

9789377373757

ISBN-10 9377373751
Binding

Paperback

Number of Pages 200 Pages
Language (English)
Weight (grms) 205
Subject

Poetry

दूसरा सप्तक के प्रथम कवि, भवानी प्रसाद मिश्र की यह पहली पुस्तक थी जिसका प्रकाशन 1956 में हुआ था। भाषा की सादगी और जीवन-जगत से जुड़ी सहज भावनाओं की छन्दबद्ध अभिव्यक्ति के चलते इस संग्रह ने अपने समय की हिन्दी कविता को एक नया मोड़ दिया था।

इस संग्रह में शामिल शीर्षक कविता ‘गीत-फ़रोश’ आज तक उतनी ही लोकप्रिय है जितनी उस समय थी।

विचार से गांधीवादी भवानी प्रसाद मिश्र मानते थे कि कविता की रचना उसी भाषा में होनी चाहिए जिस भाषा का प्रयोग आम जनजीवन में जनसाधारण करता है। ‘जिस तरह तू बोलता है उस तरह तू लिख’ कहने वाले इस कवि ने अपनी पूरी रचना-यात्रा में इस संकल्प का निर्वाह किया।

‘गीत-फ़रोश’ की कविताओं में प्रकृति और जीवन का प्राकृतिक उदात्त भाव बिना किसी अवरोध के जल-धारा की तरह प्रवाहित होता है; लेकिन वह जीवन के जटिल भावबोध को, आशा-निराशा-असमंजस को अनदेखा नहीं करता। किसान-जीवन के दुख, निर्बल जन की नाउम्मीदी और पीड़ा का आख्यान भी इन कविताओं में अपने पूरे आवेग के साथ आता है। लेकिन ये कविताएँ उम्मीद को हाथ से नहीं जाने देतीं, यही इनकी शक्ति है जो आज तक इन्हें जीवित रखे हुए हैं—

मुझे विश्वास है, शाश्वत नहीं है वेदना कोई,

उसे फिर प्राण मिलते हैं कि जिसने चेतना खोई।

Bhawaniprasad Mishra

भवानी प्रसाद मिश्र बीसवीं सदी की हिन्दी कविता में अपने अलग काव्य-मुहावरे और भाषा-दृष्टि के साथ-साथ स्वदेशी चेतना की तेजस्विता और कविता की प्रतिरोधक आवाज़ की पहचान बने भवानी प्रसाद मिश्र का जन्म 29 मार्च, 1913 को ज़‍िला होशंगाबाद के नर्मदा-तट के एक गाँव टिगरिया में हुआ। 1930 में उन्होंने लिखा—'जिस तरह हम बोलते हैं उस तरह तू लिख।’ जीवन की शुरुआत मध्य प्रदेश के ही बैतूल ज़‍िले में एक पाठशाला खोलकर, किन्तु सन् बयालीस के ‘भारत छोड़ो आन्दोलन’ में लगभग तीन साल का क़ैदी जीवन बिताने के बाद गांधी और उनके सहयोगियों के साथ रहे। कुछेक दिनों तक 'कल्पना’ (हैदराबाद) में। फ़‍िल्मों और आकाशवाणी में काम। इसके बाद सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय के हिन्दी खंड के सम्पादक। बाद में ‘गांधी मार्ग’ जैसी विशिष्ट पत्रिका के सम्पादक के रूप में साहित्यिक पत्रकारिता की एक रचनात्मक धारा का प्रवर्तन करते रहे। 20 फरवरी, 1985 को गृहनगर नरसिंहपुर में हृदयाघात से आकस्मिक मृत्यु। भवानी प्रसाद मिश्र रचनावली के कुल आठ खंडों के अलावा कवि के अन्य चर्चित कविता-संग्रह हैं—‘गीत फ़रोश’, ‘चकित है दु:ख’, ‘गांधी पंचशती’, ‘बुनी हुई रस्सी’, ‘ख़ुशबू के शिलालेख’, ‘त्रिकाल संध्‍या’, ‘व्यक्तिगत’, ‘परिवर्तन जिए’, ‘तुम आते हो’, ‘इदम् न मम्’, ‘शरीर कविता : फ़सलें और फूल’, ‘मानसरोवर दिन’, ‘सम्प्रति’, ‘अँधेरी कविताएँ’, ‘तूस की आग’, ‘कालजयी’, ‘अनाम’ और ‘नीली रेखा तक’। बाल कविताएँ—‘तुकों के खेल’; संस्मरण—‘जिन्होंने मुझे रचा’; निबन्ध-संग्रह—‘कुछ नीति कुछ राजनीति’। 1972 में उनकी कृति ‘बुनी हुई रस्सी’ पर ‘साहित्य अकादेमी पुरस्कार’ मिला। 1981-82 में उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान के ‘साहित्यकार सम्मान’ तथा 1983 में मध्य प्रदेश शासन के ‘शिखर सम्मान’ से उन्‍हें अलंकृत किया गया। निधन : 20 फरवरी, 1985
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