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| Publisher | SARVATRA |
| Publication Year | 2026 |
| ISBN-13 | 9789373172866 |
| ISBN-10 | 9373172867 |
| Binding | Paperback |
| Number of Pages | 150 Pages |
| Language | (Hindi) |
| Dimensions (Cms) | 20 x 18 x 1.2 |
| Subject | Novel |
इस पुस्तक की सबसे अच्छी बात है इस कथा का मनुष्य जीवन से सरोकार, उस पर सोने पर सुहागा यह कि यह लेखक के आत्यंतिक मानवीय चिंतन प्रक्रिया से उपजा है। ये इस कथा की दो सशक्त भुजाएं हैं। इन दिनों भारतीय समाज अत्यंत छोटे ग्रामों से पलायन करके कस्बों की ओर, कस्बों से नगर की ओर, नगर से महानगर की ओर तथा महानगर से मेट्रोपॉलिटीन सिटी तक पहुँच रहा है। वह देश छोड़कर विदेश में पहुँच जाता है किंतु अंततः हम सब अपनी जड़ों से कटकर भी पुरखों की उस मिट्टी को विस्मृत नहीं कर पाते और वह मनुष्य को जीवन भर अपनी ओर खींचती रहती है। दूसरी ओर उस ग्राम का समाज नहीं चाहता कि नगर को पलायन कर चुका व्यक्ति दोबारा अपने अनुभवों को लेकर गाँव में आए। निश्चय ही इसके पीछे कई मनोविज्ञान काम करते हैं। इन सब घटनाओं को एक सूत्र में पिरोकर लेखक ने 'द्रोह' उपन्यास की आधारशिला रखी है। यह पुस्तक इस बात की आश्वस्ति देती है कि प्रेरक लेखन जब सामाजिक, राष्ट्रीय और सार्वभौम सरोकार के साथ अवतरित होता है तो पाठक भी उसका स्वस्ति वाचन करते हैं । - डॉ. विकास दवे निदेशक, साहित्य अकादमी, मध्यप्रदेश शासन, भोपाल
Om Prakash Shukla
SARVATRA