| Publisher |
VANI PRAKSHAN |
| Publication Year |
2026 |
| ISBN-13 |
9789373489353 |
| ISBN-10 |
9373489356 |
| Binding |
Paperback |
| Number of Pages |
244 Pages |
| Language |
(Hindi) |
| Weight (grms) |
300 |
| Subject |
Literary Theory, History & Criticism |
साहित्य में कलात्मकता एवं लोकप्रियता हमेशा परस्पर विरोधी ही हो, यह ज़रूरी नहीं। कई बार साहित्य में लोकप्रियता पूरकता के अत्यन्त विशिष्ट सम्बन्ध में कलात्मकता से सम्पृक्त होती है। वस्तुतः यही आदर्श स्थिति है। बावजूद इसके इस सन्दर्भ में पास्तरनाक की एक चेतावनी याद रखने योग्य है कि ‘एक लेखक को मूँगफली की तरह लोकप्रिय नहीं होना चाहिए।’ ब्रेष्ट के शब्दों में कहें तो सच्चे अर्थों में वही साहित्य लोकप्रिय कहा जा सकता है जो कलात्मकता के बावजूद व्यापक जनता के लिए सुबोध हो, जनता के दृष्टिकोण को स्वीकार करते हुए उसे सुदृढ़ बनाया गया हो, जनता के सर्वाधिक प्रगतिशील हिस्से को इस रूप में प्रस्तुत किया गया हो कि वह समाज में नेतृत्व का दायित्व सँभाल सके और उसमें परम्परा का बोध और विकास हो। स्पष्ट ही जहाँ इन बिन्दुओं को दरकिनार करके सस्ती लोकप्रियता प्राप्त करने की कोशिश होती है वहाँ सस्ते व सतही साहित्य का उत्पादन होता है, जिसका कलात्मकता व सौन्दर्य-बोध से दूर तक कोई रिश्ता नहीं होता।
हिन्दी कविता के इतिहास में ऐसे अनेकानेक उदाहरण मौजूद हैं जहाँ बहुत से गम्भीर होने का दावा करने वाले कवि भी ‘परिपाटीग्रस्त-अभिव्यक्ति’ की जड़ता से मुक्त होने के प्रयास में जाने-अनजाने ‘बाज़ारू-अभिव्यक्ति’ की गिरफ़्त में फँसते दिखाई देते हैं। स्पष्ट है कि ऐसी कविताओं में रीतिबद्ध भाषा की चमक, लालित्य आदि चाहे जितनी भी हो पर प्रायः उनमें भाषा की उस प्राणशक्ति का अभाव होता है जिसके बग़ैर सृजनशीलता की कल्पना तक नहीं की जा सकती। ग़ौरतलब है कि कविता में भाषा की इस प्राणशक्ति का अभाव वस्तुतः प्राणवान कथ्य के अभाव का ही द्योतक है। कविता में भाषा की प्राणशक्ति की कसौटी दुरूहता के बजाय सरलता है और सरलता हर हालत में सपाटबयानी से गुणात्मक रूप में भिन्न होती है। जो कवि सरलता और संप्रेषणीयता के नाम पर ‘बाज़ारू-अभिव्यक्ति’ को ही मॉडल बनाकर चलते हैं, वे कविता के क्षेत्र में पॉपुलिस्ट फॉर्मूले का इस्तेमाल करते हैं। जबकि सच्चाई यह है कि कविता की संप्रेषणीयता के लिए ‘पॉपुलिज्म’ कोई अनिवार्य शर्त नहीं है।
आज कवि-सम्मेलनों में पढ़ी जाने वाली ज़्यादातर कविताओं में मुद्दों के बजाय मनोरंजन पर बल है। चूँकि एकाध अपवाद को छोड़कर काव्यगोष्ठियों में काव्यपाठ करने वाले गम्भीर कवियों ने अपनी रचनाओं में से मनोरंजन का तत्त्व लगभग निकाल दिया है, इसलिए इस अन्तराल का स्वाभाविक लाभ कवि-सम्मेलनी लोकप्रिय रचनाकारों को मिला है और नतीजतन मंच की दुर्गति हुई है।
लोकप्रिय कविता संस्कृति के बाज़ार की शर्तों पर खरा उतर कर ही लोकप्रियता की मंज़िल तक पहुँचती है और पूँजीवादी बाज़ार में चिन्तन के बजाय मनोरंजन ज़्यादा बिकाऊ है। कवि-सम्मेलन में मनोरंजक कविता पर ताली बटोरने वाला रचनाकार कभी यह देखने की कोई ज़रूरत महसूस नहीं करता कि ‘ज़िन्दगी को अर्थ से आलोकित करने वाले तत्त्व क्या हैं और कहाँ हैं?’ अतः जीवन का वह बड़ा हिस्सा, जहाँ मानवीय विवेक और भावनाओं के लिए मूलभूत प्रश्न खड़े होते हैं, मनोरंजनकर्ता लेखक के हाथ से छूट जाता है। इस सीमा के बावजूद आम लोगों के बीच कवि-सम्मेलनी रचनाकारों की लोकप्रियता को नज़रअन्दाज़ नहीं किया जा सकता। जो लोग कविता को केवल छपे रूप में पढ़े जाने पर बल देते हैं उन्हें याद दिलाना शायद ज़रूरी हो कि अभिग्रहण की दृष्टि से हिन्दी कविता के इतिहास पर विचार करने से स्पष्ट होता है कि काव्य-पाठ करना एक कला है, जिसे साध लेने वाले कवि मंच पर परफॉर्मेंस के चलते लोगों के बीच अत्यन्त लोकप्रिय हुए हैं।
लोकप्रिय कविता के अभिग्रहण की प्रक्रिया पर समाजशास्त्रीय दृष्टि से विचार करने से स्पष्ट होता है कि कवि-सम्मेलनों में पढ़ी या सस्वर प्रस्तुत की जाने वाली कविताओं पर देश काल की तात्कालिक समस्याओं का सीधा प्रभाव होता है। स्मरणीय है कि दिनकर, बच्चन, नेपाली, जानकीवल्लभ शास्त्री,नीरज, रामदयाल पांडे आदि कवि एक लम्बे समय तक कवि-सम्मेलनों में भाग लेते रहे और वे गहरे अर्थ में जनता के बीच लोकप्रिय भी थे। पर धीरे-धीरे हिन्दी कवि-सम्मेलनों की गुणवत्ता का स्तर गिरता गया और आज स्थिति यह है कि प्रायः गम्भीर रचनाकार कवि-सम्मेलनों में शिरकत नहीं करते। इसके दुष्परिणाम-स्वरूप जनसुरुचि के निर्माण में लोकप्रिय संस्कृति के एक घटक के तौर पर कवि-सम्मेलन की व्यापक सामाजिक भूमिका समाप्त प्रायः है। चूँकि मंचीय कवि अपने कर्म को गम्भीरता से लेने के बजाय कवि-सम्मेलन को सिर्फ़ पैसा कमाने का ज़रिया मान बैठे हैं, इसलिए लोकप्रिय संस्कृति के नियम-क़ानून बनाने या बनवाने में उनका कोई सार्थक हस्तक्षेप सम्भव नहीं हो पाता। दूसरे शब्दों में कहें तो लोकप्रिय संस्कृति की सरिता जिस गुणवत्ता नियन्त्रण पर निर्भर करती है वह एकाध अपवाद को छोड़कर हिन्दी कवि-सम्मेलनों के सन्दर्भ में सिरे से ग़ायब है। परिणामत: हिन्दी में देश-प्रेम, महिला दिवस, प्रणय दिवस, मज़दूर दिवस, दहेज प्रथा, भ्रष्टाचार, बाढ़, सूखा, अकाल, भूकम्प, रेल दुर्घटना जैसे विषयों पर थोक के भाव में लोकप्रिय कविताओं का उत्पादन जारी है तथा हास्य-व्यंग लगभग उसका सदाबहार मुहावरा बन गया है। ऐसे में याद रखना ज़रूरी है कि दुनिया की हर मार्मिक घटना पर कविता लिखने वाला कवि सबसे कम संवेदनशील मनुष्य होता है। कहना न होगा कि आज मंचीय और फेसबुकीय कविताएँ जब धूमिल के शब्दों में कहें तो ‘व्यक्तित्व बनाने की-चरित्र चमकाने की-खाने-कमाने की—चीज़’ बनकर रह गयी हैं, तो उपर्युक्त काव्य-विवेक का अभाव क़तई आश्चर्यजनक नहीं है और वैदुष्य, काव्य कौशल, वाचन की कला और गलाबाज़ी से इस कमी की भरपाई नहीं हो सकती। ‘मारा कविता की शक्ति’ शीर्षक अपने सुविख्यात निबन्ध में चीनी कथाकार एवं संस्कृतिकर्मी लूशुन ने लिखा है कि कई बार किसी समाज का सांस्कृतिक बहरापन उसका गूँगापन भी बन जाता है। हिन्दी समाज और लोकप्रिय हिन्दी कविता के सन्दर्भ में गूँगेपन के बजाय कवियों का बड़बोलापन ज़्यादा चिन्ताजनक है। संस्कृति-बाज़ार में कवियों द्वारा हँसोड़ और उदास, दोनों प्रकार के अपने बड़बोलेपन को नाटकीय अन्दाज़ में विभिन्न नगरों व महानगरों में बेचते देखकर ‘द लेक्सस एंड ऑलिव ट्री’ नामक बहुचर्चित ग्रन्थ के विद्वान लेखक थॉमस फ्रीडमैन की एक चेतावनी याद आती है : ‘बाज़ार का छिपा हुआ हाथ, छिपे हुए मुक्के के बिना काम नहीं कर सकता है।’ सम्भवतः इस मुक्के की सबसे ज़्यादा चोट सहने के लिए कविता अभिशप्त है ।
—इसी पुस्तक से
Ravi Ranjan
जन्म : 12 जनवरी, 1979 को पटना के पास मसौढ़ा गाँव के एक किसान परिवार में.शिक्षा : एम.ए, पीएच.डी. (काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी)
लेखन : इंद्र बसावड़ा कृत उपन्यास 'घर की राह' का संपादन.
भारतीय नवजागरण और रामविलास शर्मा का चिन्तन.
गोरख पाण्डेय : व्यक्ति और रचना.
2012 से 'लोकचेतना वार्ता' त्रैमासिक पत्रिका का संपादन.
सम्प्रति : 'झारखण्ड में हूँ' रिपोर्ताज़ लेखन में सक्रिय और झारखण्ड के ही एक कॉलेज में हिंदी की अध्यापकी.
Ravi Ranjan
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