| Publisher |
VANI PRAKSHAN |
| Publication Year |
2026 |
| ISBN-13 |
9789369443253 |
| ISBN-10 |
9369443258 |
| Binding |
Hardcover |
| Number of Pages |
804 Pages |
| Language |
(Hindi) |
| Weight (grms) |
950 |
| Subject |
Literary Theory, History & Criticism |
क्या उपनिवेशवाद पर पूर्ण विराम लग चुका है? यह आधुनिक इतिहास के सबसे मुश्किल और अहम सवालों में से एक है। अपने ख़ात्मे के हर एलान के बावजूद उपनिवेशवाद बार-बार साबित करता है कि अभी उसका अन्त नहीं हुआ है। राजनीतिक विउपनिवेशीकरण और उत्तर औपनिवेशिक अकादमिक आलोचना के एक लम्बे दौर के बाद भी यह उलझन बची हुई है। साम्राज्यिक नियंत्रण की एक परत हटते ही अब तक ओझल उसकी दूसरी परत सामने आ जाती है। उपनिवेशवाद की आलोचना, इसीलिए, आज भी आधुनिक संसार का एक गुरुतर बौद्धिक कार्यभार है।
अभय कुमार दुबे की यह महत्त्वाकांक्षी कृति इस सिलसिले में एक नयी बहस का प्रभावी उद्घाटन करते हुए उत्तर औपनिवेशिकता और डि-कोलोनियलिटी के मौजूदा विमर्श को एक नये चरण में ले जाने की कोशिश करती है। हमारे ज्ञानात्मक संसार में बर्बरों के आगमन की घोषणा से शुरुआत करते हुए अभय की इस रचना में युरोकेन्द्रीयता के उद्गम की शिनाख़्त प्राचीन यूनानी दर्शन में की गयी है। फिर यह सिलसिला दिखाता है कि किस प्रकार आधुनिक युरोपीय विचार का असामान्य अन्तरण ज्ञान के साम्राज्यिक बन्दोबस्त में हुआ, वर्चस्वी भाषा अंग्रेज़ी इसकी वाहक बनी, और किस तरह औपनिवेशिक
ज्ञान-पद्धतियों के उन परिचित रूपों का भारत में आगमन हुआ जिनका इस्तेमाल हम आज भी बड़े पैमाने पर करते जा रहे हैं।
ज्ञानात्मक धरातल पर अभय द्वारा बुने गये विमर्श से अगर कोई एक बात बेसाख़्ता याद आती है तो वह है अल्पविकास के विकास पर किया जाने वाला चिन्तन। ज़ाहिरा तौर पर यहाँ सन्दर्भ अर्थव्यवस्था का न हो कर इतिहास और समाज-विज्ञान के ज्ञानात्मक अर्थशास्त्र का है। उनके द्वारा उठायी गयी ज़ोरदार बहस की सबसे बड़ी चुनौती
उस मुकाम पर निहित है जहाँ भाषा और ज्ञान के रिश्ते की विधेयकता को रेखांकित किया गया है। उनका सवाल है कि अगर ज्ञानात्मक विउपनिवेशीकरण करना है तो क्या उसके लिए औपनिवेशिक भाषा ही चाहिए? वे बड़े प्रभावी ढंग से तर्क देते हैं कि औपनिवेशिक चिन्तन के तौर-तरीक़ों से अगर छुटकारा पाना है तो हमें देशभाषाओं के संसार में रमना होगा, और साथ ही, ज्ञान की प्राक्-औपनिवेशिक परम्पराओं की गहराइयाँ छाननी होंगी। उत्तर औपनिवेशिक बुद्धिजीवियों की उपेक्षा के कारण ये ज्ञान-परम्पराएँ गतिरोध, एकाकीपन और निरर्थकता में धकेल दी गयी हैं।
अभय कुमार दुबे की यह किताब हमसे पूछती है कि क्या हम
समस्या का हल खोज रहे हैं, या स्वयं ही समस्या के एक अंग हैं।
इस पुस्तक से भाषा, ज्ञान और उपनिवेशित समाजों की संस्कृति के बीच सम्बन्धों पर चर्चा की नयी लहर पैदा होनी चाहिए।
—सुदीप्त कविराज
Abhay Kumar Dubey
Abhay Kumar Dubey is a journalist and writer. He is writer of several books including 'Bharat Mein Rajniti-Kal Aur Aaj', 'World-famous Great Treasures' etc. Abhay Kumar Dubey is active political participant in Indian media.
Abhay Kumar Dubey
VANI PRAKSHAN